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#जीवनसंवाद : अपनी अच्छाई!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: December 21, 2019, 9:01 AM IST
#जीवनसंवाद : अपनी अच्छाई!
जीवन संवाद

Jeevan Samvad: दूसरों के लिए दरवाजे बंद करने से आपके लिए खुलने वाली खिड़कियां भी धीरे-धीरे बंद होती जाती हैं. आपकी अच्छाई आपकी जिंदगी का ऑक्सीजन है. इससे दूर मत जाइए!

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  • Last Updated: December 21, 2019, 9:01 AM IST
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अपने बारे में डूबकर बात करते हुए अक्सर हम अपनी उस अच्छाई का जिक्र करते हैं जो हमें बहुत प्रिय होती है. पहले अक्सर ऐसी चीजों का हम जिक्र किया करते थे. अब लगता है यह किसी बीते जमाने की बात है. जबकि ऐसा है नहीं. हम सब अब भी उतने भले हैं जैसे पहले कभी थे. हां इतना जरूर हुआ है कि उस भलाई की ओर हमारा ध्यान बहुत कम जाता है. हमने खुद को ऐसी चीजों में उलझा दिया है, जहां शोर बहुत है. जब शोर बढ़ जाता है तो दूसरों को दूर खुद को सुनना भी मुश्किल हो जाता है. हमें शोर की आदत पड़ जाती है. उसका अभ्यास हो जाता है.

प्रिय कवि, उपन्यासकार विनोद कुमार शुक्ल ने कुछ दिन पहले एक बातचीत में बड़ी खूबसूरत बात कही. वह कहते हैं, 'अपनी अच्छाई एक अचानक खोई हुई चीज है, जो ठोकर खाने से मिलती है. पारखी होने के लिए अनुभवी होना जरूरी होता है.'

कुछ हासिल करने के सफर में हम खुद को अपनी ही उन अच्छाइयों से दूर करते चले जाते हैं जो हमारे मन, आत्मा का मैल दूर करती हैं. जिंदगी को ऑक्सीजन देती हैं. इसी सरलता से समझते हैं. आपने किसी व्यक्ति की मदद की. उसने आगे चलकर आप को भुला दिया. आप उसकी गलती की सजा स्वयं को देते हैं. लोगों की मदद करना बंद कर देते हैं. जबकि आप स्वयं दूसरों की सहायता से आगे बढ़ रहे हैं.

यह अपनी अच्छाई को खोना है. अपनी अच्छाई को खोकर हम खुद तक पहुंचने वाली खुशी को रोकने का काम करते हैं. दूसरों के लिए दरवाजे बंद करने से आपके लिए खुलने वाली खिड़कियां भी धीरे-धीरे बंद होती जाती हैं. आपकी अच्छाई आपकी जिंदगी का ऑक्सीजन है. इससे दूर मत जाइए!


हम ऐसे जीवन की ओर बढ़ रहे हैं, जहां सुख सुविधाएं तो तेजी से बढ़ रही हैं लेकिन हमारी सामाजिकता निरंतर घट रही है. पहले हम एक बड़े परिवार, समाज और आसपास का हिस्सा होते थे. अब यह समाज बमुश्किल दो/चार/दस लोगों तक सिमट गया है. इस सिमटने का असर यह हुआ कि हमने यह मान लिया कि हमें जो भी अच्छा करना है, केवल उनके साथ करना है. मदद करनी है तो इनकी. मदद लेनी है तो इनसे.


यह हमारी अच्छाई का सिकुड़ते जाना है. कुछ लोगों के व्यवहार से हम आहत/दुखी हो सकते हैं लेकिन हमें उस दुख को खुद पर लादे नहीं रहना है. निरंतर आगे बढ़ने की यही प्रक्रिया है. स्वयं को जीवंत, प्रासंगिक और प्रसन्न बनाए रखने के लिए यह जरूरी अभ्यास है. जो आपकी मदद करता है, उसका नाम हमेशा ऐसे याद रखिए जैसे चट्टान पर लिखे गए शब्द. जिसने आपका साथ नहीं दिया उसे ऐसे याद रखना है जैसे रेत पर लिखे गए नाम. अच्छाई को बचाए रखने की प्रक्रिया में यह बहुत मददगार है.
पता : दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
Network18
एक्सप्रेस ट्रेड टावर, 3rd फ्लोर, A विंग
सेक्टर 16 A, फिल्म सिटी, नोएडा (यूपी)
ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com
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First published: December 20, 2019, 12:06 PM IST
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