#जीवनसंवाद: जिंदा रहते माफ़ी, मिलना और कहना!

#जीवनसंवाद: जिंदा रहते माफ़ी, मिलना और कहना!
जीवन संवाद

Jeevan Samvad: प्रेम का अर्थ रस्म, रिवाज और आडंबर में नहीं है. प्रेम जीवित व्यक्तियों के साथ किया जाने वाला सहज व्यवहार होना चाहिए. प्रेम की जरूरत सबसे अधिक जीवित व्यक्तियों को है. आपके साथ और मिलने-जुलने की दरकार सबसे अधिक जीवित व्यक्तियों को है.

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सोशल मीडिया पर अक्सर ऐसी कहानियां आती रहती हैं, जिनमें इस बात का जिक्र होता है कि अपने बुजुर्ग माता-पिता से उनके बच्चे मिलने जाने वाले ही थे कि उनके नहीं रहने की खबर आ गई. बच्चे बस सोचते ही रह गए. किसी से मिलना टालते ही रहते हैं कभी मानसिक तो कभी शारीरिक दूरी के चलते. एक दिन पता चलता है अब कभी नहीं मिल पाएंगे! कितना कुछ हम सोचते रहते हैं, माफी मांग लें किसी से अपने छोटे -छोटे गिले-शिकवे के लिए! लेकिन नहीं कर पाते. अचानक एक दिन पछतावा ही बाकी रहता है. जब पता चलता है, अब उनसे कभी मिलना नहीं हो पाएगा!

किसी के नहीं रहने पर उससे मिलने का कोई अर्थ नहीं. हम उसके रिश्तेदारों से तो मिल लेते हैं लेकिन उससे तो कभी नहीं मिल सकते. यहीं पर सबसे बड़ा प्रश्न है, प्रेम किससे है. अगर उस मनुष्य से होता तो मिलने की लगन गहरी होती. लेकिन प्रेम व्यक्ति से ना होकर रिवाज से है. रस्म से है. जिंदा रहने पर जिनके लिए लोग तरसते रहते हैं, वह सहज उपलब्ध नहीं हो पाते. लेकिन जैसे ही दुनिया से चले जाते हैं, समय का संकट खत्म हो जाता है.

ऐसी भीड़ बेमानी है, इसका कोई अर्थ नहीं! कोरोना के संकट के बाद अब यह संभव है कि ऐसी भीड़ भी देखने को न मिले जो पहले सहज दिखती थी. इसलिए प्यार को टाला न जाए!




सिकंदर का नाम तो आपने खूब ही सुना होगा! विश्व विजेता, जिसके आगमन की सूचना से वृक्ष, फूल, नदी, पर्वत तक चिंतित होते थे. जब सिकंदर को यह बता दिया गया कि उसका बचना संभव नहीं तो उसने आदेश दिया कि उसकी शव यात्रा में दोनों हाथ एकदम खोल दिए जाएं. उंगलियां खुली रहें. उसकी हथेलियां लोगों को दिखनी चाहिए. कहतेे हैं, सिकंदर को उसके सेनापति ने यह कहते हुए रोकना चाहा- आप सम्राट हैं. यह रिवाजों के विरुद्ध है. लेकिन सिकंदर ने कहा था, जनता का यह समझना जरूरी है कि मेरी विजय का परिणाम केवल यह खाली हाथ हैं. रिक्तता अंतिम सत्य है! याद रहे, इतिहास में सिकंदर को वह जगह हासिल नहीं हासिल हो सकी जो सम्राट अशोक को मिली.


अशोक को यह जगह क्षमा, प्रेम और अहिंसा की वजह से मिली. उसके शक्तिशाली साम्राज्य का इससे कोई सरोकार नहीं. सत्ता तक पहुंचने का जो रास्ता सिकंदर के पास था, अशोक भी उसी रास्ते चलकर वहां तक पहुंचे थे, लेकिन अशोक जीवन के उस लक्ष्य को बुद्ध की सहायता से समझ गए, जिसके लिए सिकंदर के पास कम समय बचा. हमारी सबसे बड़ी जीत भी साधारण क्षमा से छोटी है!

हम एक-दूसरे को पराजित करने के ख़तरनाक खेल में कूद गए हैं. जबकि हमें एक-दूसरे को हराने की जगह माफ़ करने, गले लगाने और प्रेम करने वालों की सबसे अधिक जरूरत है. मनुष्यता के बिना मनुष्य शब्द का कोई अर्थ नहीं. खुशबू के बिना फूल का क्या कीजिएगा!


कोई भी शिक्षा अगर हमारे जीवन में न उतर पाए तो वह निरर्थक हो जाती है. प्रेम, अहिंसा और सद्भाव हमारी किताबों से ही बाहर नहीं निकाले गए, जीवन से भी धीरे-धीरे छूटते जा रहे हैं. नैतिक शिक्षा बच्चों की से जुड़ी सबसे बुनियादी और जरूरी बात है, जो हमें एकदम गैर जरूरी लगने लगी. पौधों को नष्ट करके हम पर्यावरण को सुखी नहीं कर सकते.

ठीक इसी तरह मनुष्यता को बचाने के लिए हमें सबसे पहले बच्चों और स्वयं को प्रेम से भरना होगा. प्रेम का अर्थ समझना होगा. प्रेम का अर्थ रस्म, रिवाज और आडंबर में नहीं है. प्रेम जीवित व्यक्तियों के साथ किया जाने वाला सहज व्यवहार होना चाहिए. प्रेम की जरूरत सबसे अधिक जीवित व्यक्तियों को है. आपके साथ और मिलने-जुलने की दरकार सबसे अधिक जीवित व्यक्तियों को है.


इसलिए, जीवन को खाली करते, माफ करते चलिए. माफी मांगते चलिए. मिलने का केवल अरमान मत रखिए. मिलते चलिए. कहने के लिए प्रतीक्षा मत करिए. कहते चलिए. इससे मन के बोझ हल्के होते हैं. मन की सेहत अच्छी रहती है. और इन दोनों से हमारे जीवन में प्रसन्नता सहज हो जाती है. अगर हम सहजता को उपलब्ध हो सकें तो जीवन में अनेक संकट अपने आप हमसे दूर हो जाते हैं. जैसे तेज हवाएं प्रदूषण को हमसे दूर ले जाती हैं. वैसे हल्के मन हमारे जीवन को तनाव से बहुत दूर रखते हैं. शुभकामना सहित...

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