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#जीवनसंवाद: शिकायत वाला मन!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: December 9, 2019, 3:41 PM IST
#जीवनसंवाद: शिकायत वाला मन!
#जीवनसंवाद

#जीवनसंवाद: जिंदगी से हमें बहुत कुछ मिला है. इसलिए, इससे शिकायत का कोई अर्थ नहीं. इससे केवल प्रेम किया जा सकता है. बस यही किया जाना चाहिए. जिस तरह नदी से शिकायत नहीं की जाती. समंदर से शिकवा नहीं किया जाता. वैसे ही जीवन से केवल प्रेम किया जाता है.

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  • Last Updated: December 9, 2019, 3:41 PM IST
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महात्‍मा बुद्ध के मठ का एक सुंदर प्रसंग है. उनके यहां एक नया शिष्‍य आया. दूसरे ही दिन उनसे कहा, मठ का भोजन ठीक नहीं है. बुद्ध ने उसे शांत मन से भोजन करने को कहा. तीसरे दिन उसने बिस्‍तर से असंतोष जताया. अगले दिन उसे अपने साथी के व्‍यवहार से दुख हुआ. अगले दिन महात्‍मा ने उसे समझाते हुए कहा, कुल चार दिन में तीन शिकायतें. यह स्‍थान तुम्‍हारे लिए सही नहीं है. तुम सही जगह नहीं हो. जीवन में बिना कष्‍ट के कुछ भी हासिल करना संभव नहीं. लक्ष्य जितना बड़ा होता है, हमारी असुविधा भी उसी अनुपात में बढ़ जाती है.

शिकायत वाले मन के साथ बहुत दूर नहीं चला जा सकता. स्‍वभाव की कोमलता, स्‍नेह इसके साथ नहीं ठहरते. तनाव के झोंके बार-बार असहज करते रहते हैं.
इसलिए, असुविधा सहने का अभ्यास जरूरी है. मजेदार बात है कि हम बच्‍चों को हमेशा यही समझाते रहते हैं कि जिद मत करो. जो हम दे रहे हैं, उसके साथ संतुष्‍ट रहो, लेकिन हम स्‍वयं इसके वि‍परीत व्‍यवहार करते हैं. अपने मन को हमसे अधि‍क कोई कमजोर नहीं करता. इसलिए, मन की सेहत, उसकी ऊर्जा, स्‍नेह के प्रति हमेशा सतर्क, सहज रहिए.

मन हमें असंतुष्‍ट करने वाले सबसे बड़ा कारकों में से एक है. इसलिए यह जरूरी है कि हम इस बात को अच्‍छे से समझें कि मन हमें कहीं उस दिशा में तो नहीं धकेल रहा है, जहां हम नहीं जाना चाहते हैं. थोड़ा ध्यान दीजिए, जैसे ही आप कोई संकल्‍प लेते हैं, इरादा करते हैं, उसके अगले ही पल उस पर सबसे बड़ा सवाल कहां से आता है.
उस पर अगला संदेह कहां से आता है. यह वही शिकायत वाला मन लेकर आता है. इसलिए, जब भी किसी बड़े काम की ओर बढ़िए. कुछ नया इरादा करिए, तो इस बात का खास खयाल रहे कि शिकायत वाले मन की बातें मन पर गहरी छाया न डाल सकें. यह हमें कमजोर बनाता है. हमेशा संशय, दुविधा, संकोच में स्‍वयं को लपेटे रखता है.

जिंदगी से हमें बहुत कुछ मिला है. इसलिए, इससे शिकायत का कोई अर्थ नहीं. इससे केवल प्रेम किया जा सकता है. बस यही किया जाना चाहिए. जिस तरह नदी से शिकायत नहीं की जाती. समंदर से शिकवा नहीं किया जाता. वैसे ही जीवन से केवल प्रेम किया जाता है. यह तभी संभव होगा, जब हमारा मन सेहतमंद, स्‍नेह और दुलार से लबालब हो.

आप अपने जीवन में जिस किसी को बड़ा मानते हों, उसकी जिंदगी के पन्‍ने पलट कर देखिए. उसमें मन की दृढ़ता का गहरा भाव मिलेगा. जिसमें यह नहीं है, वह संघर्ष के बाहरी स्‍तर पर ही उलझा रहता है.
निर्णय नहीं करना, मनुष्‍य का अपने प्रति किया जाने वाले सबसे बड़ा अपराध है. हम सोचते ही रहते हैं, कारवां गुजर जाता है. उसके बाद कहीं जाकर हमें एहसास होता है कि अरे, हम कहीं ठहर गए थे. थम गए थे.


शिकायत वाले मन से स्‍वयं को बचाने का एक तरीका यह है कि मन की निरंतर मरम्‍मत करते रहिए. जिस तरह गाड़ी की सर्विसिंग कराते रहते हैं. वैसे ही मन की भी करवाएं. मन के क्लच, वायर और सबसे बढ़कर ग्रीसिंग (स्‍नेहन) का खयाल रखें. इससे उसे सेहतमंद बनाए रखने में आसानी होगी.
मन शिकायती इस कारण भी होता जाता है कि हम चाहते कुछ और हैं. करते कुछ और हैं. सोचते कुछ ‘दूसरा’ ही रहते हैं. इससे अनजाने में हम ऐसा व्यक्तित्व गढ़ते जाते हैं जो हमारा नहीं हो करके भी हमारा हो जाता है. दुनिया की जिम्मेदारियां निभाने का यह अर्थ नहीं होना चाहिए कि हम स्वयं को ही न बचा सकें. स्‍वयं को बचाने में नियमित संवाद अहम भूमिका निभा सकता है. इससे मन को जरूरी ऊर्जा , प्रेम और स्‍नेह मिलता रहता है.

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: November 29, 2019, 12:13 PM IST
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