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#जीवनसंवाद: कोरोना और हमारी वैज्ञानिकता!

जीवन संवाद

जीवन संवाद

JeevanSamvad: कोरोना के साथ यह लड़ाई लंबी चलने वाली है, इसलिए 'मुझे कुछ नहीं होगा', जैसे मुगालते जितनी जल्दी उतार फेंक दिए जाएंगे. हमारा जीवन उतना ही सुरक्षित होगा.

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कोरोना ने हमें संकट के साथ एक अवसर दिया है, तेज भागती दौड़ती जिंदगी में थोड़ा ठहरने का. यह एक अल्पविराम है. हम सबका जीवन जितना भी बड़ा है, उसमें हमारे होश संभालने के बाद संभवतः यह पहला अवसर है, जब हम सब एक घोषित मेडिकल इमरजेंसी (आपातकाल) का सामना कर रहे हैं. दुनिया में मनुष्य समाज पर एक सामूहिक संकट है. इससे पहले दुनिया ने कुछ अपवादों को छोड़कर अपने अस्तित्व पर इतना बड़ा संकट महसूस नहीं किया था.

जिन्हें हम विकसित देश/समाज समझते थे, वह इतने खोखले हो जाएंगे इसका हमें अंदाजा नहीं था. जिन देशों की हम दुहाई देते थे, वहां बुजुर्गों को मरने के लिए छोड़ दिया गया है. अमेरिका में बीस लाख से अधिक लोगों के मरने की आशंका जताई जा रही है. अपने देश की विडंबना देखिए कि हम सब वैज्ञानिक उपाय और इस वायरस से लड़ने के तौर-तरीकों से परिचित होने की जगह टोने-टोटके में उलझे हैं. जिन अफसरों के भरोसे समाज को छोड़ा गया है, वही सबसे ज्यादा अवैज्ञानिक दृष्टिकोण अपना रहे हैं.

न्यूयॉर्क टाइम्स ने दुनियाभर के वैज्ञानिकों से बातचीत के आधार पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की है, जिसका सारांश यही है कि इस समय हमारे पास घर में कैद रहने और पूरी शक्ति से लोगों से दूर रहने के अलावा कोई दूसरा उपाय नहीं है.

यही बात बार-बार हमारे डॉक्टर भी कह रहे हैं. इसलिए पहला काम तो यह कीजिए कि व्हाट्सएप सलाह को छोड़कर खुद को घर में कैद कीजिए. कल रात एक मित्र अचानक गाड़ी लेकर दुनिया का हाल जानने निकल पड़े. मेरे घर के बाहर पहुंचकर उन्होंने फोन किया. कहा, डरिए नहीं बाहर निकलिए. हमें भय और सुरक्षित रहने के बीच का अंतर समझना बहुत जरूरी है. मुझे बुलाने के लिए उन्होंने अनेक प्रेरक प्रसंग सुनाए. यह बात और हुई कि मैं साहस नहीं जुटा पाया , उनसे मिलने का. ऐसा उनने तब किया जब एक दिन पहले वह लोगों से/मुझसे कह रहे थे कि अब एक ही उपाय है, घर में रहिए. मित्र, साइंस ग्रेजुएट हैं. विज्ञान के बारे में सभी जरूरी बातें जानते हैं. लेकिन बातें जानना और जीवन में वैज्ञानिक रवैया अपनाना दोनों अलग-अलग बातें हैं. इसीलिए, उनके कोरोना के बारे में एक दिन पुराने विचार आसानी से बदल गए. हमारे समाज के साथ यह सरल समस्या है, हम किसी चीज पर अधिक देर टिके नहीं रह पाते. आप मेरी इस बात से असहमत हो सकते हैं, लेकिन सच तो यही है कि हम वैज्ञानिक दृष्टिकोण और विज्ञान जानने/समझने, उसे जीवन में उतारने से बहुत दूर हैं. हम उन चीजों के प्रति अधिक आकर्षित हैं जो तर्क से दूर हैं. जो चला आ रहा है उसकी तरफ हमारा मुंह इतना अधिक है कि हम हर 'नई' (वैज्ञानिक दृष्टिकोण) चीज से दूर हैं. हमें संकट तब तक महसूस नहीं होता, जब तक वह हमारे गले की हड्डी न बन जाए. याद कीजिए हमारे राजाओं की कहानियां. कैसे वो आपस में लड़ते रहते थे और तब तक तैयारियों पर ध्यान नहीं देते थे, जब तक शत्रु किले की दीवार तक न पहुंच जाए. उसके बाद वह वीर रस से भरी बातें करते थे. उनकी पराजय आक्रमणकारी की शक्ति से अधिक अपनी व्यूह रचना, अपने लोगों के दल-बदल के कारण होती थी. उसके बाद जो कुछ हुआ वह इतिहास है. यह एक विचित्र जीवन शैली है जो हजारों वर्षों से हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गई है.

जो लोग डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों की बातों की अनदेखी कर रहे हैं वह हमारे लिए पुराने जमाने के उन राजाओं जैसे ही हैं जिन्होंने अपने लोगों को बड़े संकट में डाल दिया था. भारत में यह मान्यता बहुत आम होती है कि यह बीमारी मुझे नहीं हो सकती. जितनी तेजी से संक्रमण की संख्या बढ़ रही है उसके प्रति उतनी तेजी से सतर्कता नहीं बढ़ रही. वैसे यह अकेले भारत का संकट नहीं है. अमेरिका और यूरोप के कुछ शहरों से ऐसी खबरें आई हैं कि लोग डॉक्टरों और वैज्ञानिकों की बात न मानकर छुट्टियां और उत्सव मना रहे हैं.


नोएडा से सटी जिस कॉलोनी मैं रहता हूं, पिछले 48 घंटे में वहां, पंद्रह से अधिक भारतीय दुनिया के अनेक हिस्सों से घर पर लौटे हैं. ऐसे लोगों की संख्या हर दिन बढ़ती जा रही है. उसके बाद भी लोग सुबह-शाम यह जानने निकल पड़ते हैं कि 'लॉकडाउन' में सब ठीक तो है. कोई घर से बाहर तो नहीं निकल पड़ा. सड़कों पर घूमकर बताते हैं, हमें डरना नहीं है! यह कैसी वैज्ञानिकता है! यह तो उन स्वास्थ्यकर्मियों/ डॉक्टरों का अपमान है जो हमें बचाने के लिए रात-दिन सेवा में जुटे हैं.

हम जीवन के प्रति वैज्ञानिक सोच, वैज्ञानिकता से दूर निकल गए हैं. हमें कोरोना का शुक्रगुजार होना चाहिए कि उसने हमें इस बात का बोध कराया. यह प्रकृति का स्पष्ट, सख्त संदेश (चेतावनी) है, वह मनुष्य की मनमानी नहीं सहेगी!

कोरोना के साथ यह लड़ाई लंबी चलने वाली है. इसलिए 'मुझे कुछ नहीं होगा', जैसे मुगालते जितनी जल्दी उतार फेंक दिए जाएंगे. हमारा जीवन उतना ही सुरक्षित होगा.

दयाशंकर मिश्र
ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com अपने सवाल और सुझाव इनबॉक्‍स में साझा करें:
(https://twitter.com/dayashankarmi )(https://www.facebook.com/dayashankar.mishra.54)

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