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#जीवनसंवाद : कोरोना और प्रेम की कमी!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: March 24, 2020, 9:41 PM IST
#जीवनसंवाद : कोरोना और प्रेम की कमी!
जीवन संवाद

JeevanSamvad: हमारी मन: स्थिति कितनी अस्थिर है. एक दिन हम कोरोना से बचाने वाले नायकों के लिए ताली बजाने का काम करते हैं और कुछ ही घंटों बाद उन्हें अपने घरों से दूर करने में जुट जाते हैं. यह मन में दबी हिंसा का बाहर आना है.

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  • Last Updated: March 24, 2020, 9:41 PM IST
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दिल्ली में डॉक्टर्स एसोसिएशन ने सरकार से शिकायत की है कि रेजिडेंट डॉक्टरों को विभिन्न कॉलोनियों में विरोध का सामना करना पड़ रहा है. लोगों को लग रहा है कि डॉक्टरों के साथ संक्रमण उनकी कॉलोनी/ घर तक पहुंच सकता है. हमारी मन: स्थिति कितनी अस्थिर है. एक दिन हम कोरोना से बचाने वाले नायकों के लिए ताली बजाने का काम करते हैं और कुछ ही घंटों बाद उन्हें अपने घरों से दूर करने में जुट जाते हैं.

कोरोना के बीच मनुष्य जब अपने अस्तित्व के लिए लड़ रहा है, ठीक इसी वक्त यह समझना जरूरी है कि उसका अस्तित्व कैसे बचेगा. जो लोग कोरोना से बचाव की लड़ाई के प्रहरी हैं, उनके प्रति हमारा व्यवहार हर दिन इतना अधिक नकारात्मक होता जा रहा है कि कोरोना से अधिक चिंता उस हिंसा की है जो हमारे भीतर घर करती जा रही है. यह केवल दिल्ली की स्थिति नहीं है. हमारी अपनी सुरक्षा में जुटे डॉक्टरों और पुलिस के प्रति हमारा रवैया बहुत अधिक नकारात्मक है.

प्रेम, केवल वह नहीं है, जो हम दूसरों से करने का दावा करते हैं. असल में हम प्रेम करते नहीं यह होता है. क्या यह संभव है कि किसी को सिखा-पढ़ा कर प्रेम के लिए तैयार किया जाए? नहीं. बल्कि यह उससे कहीं आगे जाकर अपने आप होने वाली प्रकट होने वाली उदात्त भावना है.


कोरोना के बीच ऐसे लोग भी सामने आ रहे हैं जो अपनों पर निर्भर लोगोंं के लिए उदार मन से पेशकश कर रहे हैं. लेकिन ऐसे लोगोंं की संख्या अभी कहीं अधिक है, जो अपनेे घरेलू सहायकों को महीने/15 दिन बिना काम के पैसे देने केेे ख्याल से ही बेचैन हुए जा रहे हैं. जबकि इसमें सेेे बहुत से लोग ऐसेे भी हैं, जिनको कंपनियां अगले कुुछ महीने नाम मात्र के काम का पैसा दे रही हैं. अपने लिए तो संसार की सारी उदारता चाहते हैं लेकिन दूसरोंं के लिए अधिकतम कठोरता मन में रखते हैं. कोरोना के बीच अभी हमारी उदारता वैसी सामनेे नहीं आई जितनी कठोरता, नासमझी आई है. इसीलिए हम अपनी ही सेवा में जुटे डॉक्टरोंं का अपमान कर रहे हैं. घरेलू सहायकोंं के प्रति कठोर हुए जा रहे हैं. प्रेम का भाव चित् में गहरे इसलिए भी बैैठ जाता है, क्योंकि उसका उपयोग निरंतर नहीं होता.



अपने आसपास देखिए, हम प्रतीकात्मक रूप से किन चीजों में उलझे हुए हैं. तालियां बजाना और धन्यवाद देना खराब नहीं है, लेकिन जरा सोचिए कहा क्या गया था और हुआ क्या. क्योंकि इसमें एक किस्म का आवेग है. उत्तेजना है. सब कर रहे हैं इसलिए आप भी कर रहे हैं. इसे ऐसे भी कहा जा सकता है कि आप कर रहे हैं इसलिए दूसरे भी कर रहे हैं. जबकि इसमें नकल की जगह विवेक को होना चाहिए था. उन तालियों का हम क्या करेंगे, जिनकेे हाथ अपनी ही कॉलोनी में डॉक्टरोंं के लिए दरवाजे बंद कर रहे होंगे. हम अपनी ही पुलिस से ऐसे लड़ रहे हैं मानिए वह हमारी जान की दुश्मन हो. इस विशाल देश की चुनौतियां भी विशाल हैं. हमें परेशान डॉक्टर और पुलिस केे लिए संवेदनशील और प्रेम से भरा मन चाहिए.



प्रतीकों से ऊपर उठकर हमें मुश्किल में पड़े अपनेे लोगों के लिए आगे आना होगा. हमारे घरेलू और दूसरे अन्य सहायक जिनसे हमारा जीवन सरल होता है, गहरे संकट में फंसने वाले हैं. उनका ख्याल कीजिए. उनको परिवार का हिस्सा मानतेे हुए, बिना मांगे उनकी मदद कीजिए. प्रकृति कुछ भी बकाया नहीं रखती, जो आप दूसरोंं को देंगे वही लौटकर आएगा.

दयाशंकर मिश्र
ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com अपने सवाल और सुझाव इनबॉक्‍स में साझा करें:
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First published: March 24, 2020, 9:41 PM IST
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