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#जीवनसंवाद : जिसके होने से फर्क पड़ता है!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: April 1, 2020, 1:20 AM IST
#जीवनसंवाद : जिसके होने से फर्क पड़ता है!
जीवन संवाद

#JeevanSamvad: मशीन की तरह उलझा मन धीरे-धीरे अपनी सुगंध खोने लगता है. प्रेम, स्नेह और वात्सल्य के पौधों को समय की खुराक नियमित रूप से मिलनी ही चाहिए. जीवन में तनाव को थामने में सबसे अधिक भूमिका इनकी ही होती है.

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अपने काम में हम कई बार इतने अधिक व्यस्त हो जाते हैं कि जिनके लिए हम 'सब' कर रहे होते हैं , उनका साथ होते हुए भी छूटने लगता है. हम उनसे दूर होने लगते हैं, जिनके लिए सब कुछ कर रहे होते हैं. हसरतों का चक्रव्यूह कुछ ऐसा ही होता है कि हम उसमें जितना उलझते जाते हैं, वह हमें उतना ही अधिक आकर्षक लगता है. हमें कहां रुकना है, यह तय नहीं कर पाते.

इस प्रक्रिया में कई बार हम भूल जाते हैं कि हम किसके लिए हैं. मशीन की तरह उलझा मन धीरे- धीरे अपनी सुगंध खोने लगता है. प्रेम, स्नेह और वात्सल्य के पौधों को समय की खुराक नियमित रूप से मिलनी ही चाहिए. जीवन में तनाव को थामने में सबसे अधिक भूमिका इनकी ही होती है.

कोरोना के बीच हमारे पास पहले की तुलना में थोड़ा अवकाश है. अगर हम जीवन रक्षक सेवाओं से नहीं जुड़े हैं तो हमारे पास अवसर है कि हम उन चीजों की तरफ़ देखें जो इस भाग-दौड़ में कहीं पीछे छूट गई हैं. ऐसे रिश्ते जिनके बिना जीवन संभव नहीं है, लेकिन हम उनके लिए साथ रहते हुए भी समय नहीं निकाल पा रहे हैं. बच्चों के लिए ही तो माता-पिता सारे चाहेे और अनचाहे काम करते हैं. हाड़तोड़ परिश्रम करते हैं. यथासंभव जतन करते हैं.




सरस जीवन में बाधा वहां से ही शुरू होती है, जहां हम सुविधा को ही सब कुछ मान लेते हैं. मुझे पटना, बिहार से डॉक्टर राजेश रंजन ने लिखा है कि वह अपने इकलौते बेटे के लिए सुविधाएं जुटाने के काम में कुछ इस तरह जुटे कि उन्हें ध्यान ही नहीं रहा कि एक अच्छे पिता के लिए बच्चे के साथ बिताए गए समय की भी उतनी ही उपयोगिता है, जितनी संसाधन की. 'जीवन संवाद' के बच्चों के लिए होने वाले सत्रों में बच्चे अक्सर इस बात की शिकायत करते हैं कि माता-पिता उनके लिए सुविधाएं जुटाने के फेर में कई बार ऐसे उलझते हैं कि उनको ही भूलने लगते हैं.



मुझे एक छोटी कहानी याद आ रही है. संभव है, आपने पहले सुनी भी हो. यह लोक कथा सरीखी है. ऐसी कथा का कोई एक लेखक नहीं होता. सब, इनमें कुछ न कुछ जोड़ते रहते हैं.

स्कूल में प्रिंसिपल साहब के सख्त रवैये और कठोर व्यवहार के कारण बहुत कम लोग उनके आसपास जाने की हिम्मत करते थे. एक दिन एक युवा शिक्षक ने उनके व्यवहार से दुखी होकर स्कूल छोड़ने का मन बनाया. उसका इस्तीफा स्वीकार कर लिया गया. अंतिम दिन वह एक गुलदस्ते और दिल के आकार के तीन छोटे-छोटे कार्ड के साथ पहुंचा. उसने वह कार्ड देते हुए प्रिंसिपल से कहा, 'मैंने आपके साथ काम करके बहुत कुछ सीखा. आप मेरे जीवन में बहुत खास हैं. यह तीन कार्ड आपके लिए हैं. पहला कार्ड आप रख लीजिएगा. बाकी दो उसे दे दीजिए, जो आपके जीवन में सबसे खास हो. जिससे आप गहरा प्रेम करते हैं. लेकिन जिससे आपने कभी अपना प्रेम प्रकट न किया हो. उससे कहिए कि एक कार्ड वह रख ले और एक कार्ड को उसी तरह आगे बढ़ाएं जैसे मैं कर रहा हूं.' यह कहकर वह युवक चला गया. प्रिंसिपल बहुत देर तक सोचते रहे. कार्ड किसे दिया जाए. कुछ सोच कर वहां उठे और घर के लिए रवाना हो गए.

घर पहुंच कर उन्होंने अपने बेटे को बुलाया. उसे वह कार्ड देते हुए कहा, मेरे बेटे मैं अक्सर ही तुमसे कठोरता से पेश आता हूं. लेकिन तुमने मुझसे कभी कुछ नहीं कहा. तुम्हारे नंबर कम आते हैं, तुम पढ़ने में कमजोर हो. इसलिए मैं अक्सर ही तुम पर गुस्सा करता हूं, नाराज रहता हूं. लेकिन तुम्हारे व्यवहार में आज तक मेरे प्रति नाराजगी नहीं दिखी. इसलिए मुझे लगता है तुम ही वह हो जो मुझे सबसे अधिक प्रेम करता है. प्रिंसिपल साहब ने ऐसा कहते हुए नम आंखों से बेटे को गले लगा लिया.

बेटा रोने लगा. बहुत देर तक सुबकने के बाद भी जब उसके आंसू नहीं थमे, तो प्रिंसिपल पिता ने उससे कहा क्या बात है बेटे ! तुम इतना क्यों रो रहे हो. बेटे ने कहा, मैं बहुत निराश हो चुका था. मुझे लगता था कि मैं आपकी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर पा रहा हूं. मेरे कारण आपको बहुत कष्ट होता है. इसलिए मैं सोच रहा था कि आज रात को मैं अपना जीवन समाप्त कर लूंगा. अगर आज आपने अपना प्रेम मुझ पर जाहिर ना किया होता. मुझे इस तरह प्यार ना किया होता तो संभव है मैं जीवन को खतरे में डाल देता. उसका जवाब सुनकर प्रिंसिपल को गहरा सदमा लगा. लेकिन कुछ ही पलों में वह स्वयं को संभालते हुए बेटे की तरफ बढ़ गया और उसे गले से लगा लिया. वह मन ही मन अपने युवा शिक्षक को आशीर्वाद दे रहे थे जो उन्हें जीवन की सबसे बड़ी शिक्षा देकर चला गया था.

मैं बहुत विनम्रता से आपसे अनुरोध करना चाहता हूं कि अपने अव्यक्त प्रेम को रोकिए मत. आपका जिससे भी अनकहा प्रेम, अनुराग है. उसे कह दीजिए. जिससे भी अनकहा प्रेम, अनुराग है. उसे कह दीजिए. यह कोई भी हो सकता है. आपका बेटा/बेटी भाई/बहन/माता/ पिता/दोस्त/ सहकर्मी/ शिक्षक/पड़ोसी/ पति /पत्नी/प्रेमी/ प्रेमिका कोई भी.

अगर आप ऐसा कर पाएं तो अपने अनुभव साझा कीजिएगा. अगर कोई परेशानी आ रही हो तो लिखिएगा. हम मिलकर रास्ता निकालेंगे.

दयाशंकर मिश्र
ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com अपने सवाल और सुझाव इनबॉक्‍स में साझा करें:
(https://twitter.com/dayashankarmi )(https://www.facebook.com/dayashankar.mishra.54)

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First published: March 31, 2020, 10:44 PM IST
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