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#जीवनसंवाद : किसका अनुभव!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: March 18, 2020, 10:06 PM IST
#जीवनसंवाद : किसका अनुभव!
जीवन संवाद

#JeevanSamvad: जबसे इंटरनेट का हमारे जीवन में प्रभाव बढ़ा है, हम दूसरों के अनुभवों से बहुत अधिक प्रभावित होने लगे हैं. इतने अधिक कि उसके आधार पर अपने फैसले करने लगे हैं. ऐसे में हमारा अपना फैसला ही असल में हमारा नहीं है.

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  • Last Updated: March 18, 2020, 10:06 PM IST
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जिंदगी में अपने सफर, चुनौतियों का सामना करते हुए हम अपने-अपने अनुभव हासिल करते हैं. हम दूसरों से भी बहुत कुछ सीखते हैं, लेकिन उस सीखने की सीमा है. सबसे अधिक सीखना केवल और केवल अपने अनुभव से संभव है. जबसे इंटरनेट का हमारे जीवन में प्रभाव बढ़ा है, हम दूसरों के अनुभवों से बहुत अधिक प्रभावित होने लगे हैं. इतने अधिक कि उसके आधार पर अपने फैसले करने लगे हैं. ऐसे में हमारा अपना फैसला ही असल में हमारा नहीं है.

पटना, बिहार से हमें 'जीवन संवाद' के पाठक राजकुमार यादव का ईमेल मिला है, जिसमें फैसले करने के बारे में गहरे सूत्र हैं. इमानदारी है, जीवन के प्रति आस्था भी. राजकुमार यादव लिखते हैं, 'मैं अपनी नौकरी अच्छे तरीके से कर रहा था, तभी मेरे एक मित्र ने ऑर्गेनिक खेती का काम शुरू किया. इसके लिए उन्होंने अपनी जमी जमाई नौकरी छोड़ दी. मेरे परिवार ने मुझसे कहा कि खेती से जुड़े कुछ अनुभव के कारण मुझे भी इस ओर जाना चाहिए. जबकि हमारी आर्थिक क्षमता ऐसा करने की अनुमति नहीं दे रही थी. पहले मैंने उन सुझावों को अनदेखा किया, लेकिन लगातार बढ़ते दबाव के कारण, सोशल मीडिया पर लगातार इस तरह के पोस्ट देखने से मेरे मन में ख्याल आया कि जोखिम लेना ही चाहिए. बिना जोखिम लिए दुनिया में कोई कुछ नहीं कर पाया. इस तरह के विचार मन में उमड़ने लगे. नौकरी छोड़ दी. अपनी जमा पूंजी और मित्रों की उधारी के साथ नए काम में लग गया. मैं केवल जोखिम के सहारे नए क्षेत्र में उतर गया. विषय की चुनौतियों पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया. मैं सोशल मीडिया पर तैरने वाली सफलता की कहानियों के बहुत अधिक प्रभाव में था. अंततः दो साल बाद मेरा काम पूरी तरह ठप पड़ गया और मेरे सामने भारी तनाव आ गया. कर्ज बढ़ता जा रहा था, लेकिन कथित सामाजिक प्रतिष्ठा के कारण मैं उसे नहीं छोड़ पा रहा था. बढ़ते तनाव और अवसाद के बीच कुछ दोस्त इस बारे में मदद कर रहे थे इसी दौरान किसी ने मेरा परिचय 'जीवन संवाद' से कराया. मुझे इससे बहुत मदद मिली और मैंने तय किया कि मैं 'लोगों के कहने की चिंता' नहीं करूंगा. मैं पूरा ध्यान अपने परिवार और स्वयं की रक्षा पर लगाऊंगा. अंततः मुझे पुरानी नौकरी वापस मिल गई और चीजें पटरी पर आ गईं.'

राजकुमार लिखते हैं कि इस अनुभव से यह बात समझ में आई कि जोखिम ही सबकुछ नहीं है. हम कई बार अपने आसपास की चीजों से बह जाते हैं. जैसे हर कोई अलग है वैसे ही उसकी क्षमताएं भी अलग हैं. दूसरे से सीखना तो काम आ सकता है, लेकिन उसका अनुभव बहुत कम मौकों पर आपके काम आएगा. आपके काम आपका अनुभव ही आएगा. ‌‌‌



हम इस ईमानदार अनुभव को साझा करने के लिए राजकुमार जी के आभारी हैं. हम सबको यह समझने की जरूरत है कि हमारा अपना अनुभव ही सबसे ठोस चीज़ है. इसलिए, हम जिस दिशा में भी जाना चाहते हैं उसके बारे में पूरी तैयारी से ही आगे बढ़ना चाहिए. दूसरों के अनुभव उपयोगी तो हो सकते हैं लेकिन जब नाव समंदर में फंसी हो, तो केवल अपने अनुभव ही काम आते हैं. जिंदगी की चुनौतियां समंदर से कम नहीं होतीं.




एक छोटी सी कहानी सुनते चलते हैं. एक राजा के दरबार में एक दिन एक मंत्री आम की टोकरी लेकर आए. उन्होंने कहा यह अत्यंत ही मीठा फल है. सेहत के लिए बहुत फायदेमंद और स्वाद में लाजवाब. यह आपके लिए है. राजा ने कहा, आप चखिए, स्वाद के बारे में बताइए. कई मंत्रियों ने उसे चखने के बाद अपने अनुभव राजा को बताए, लेकिन राजा को आम का स्वाद समझ में नहीं आया. वह तय नहीं कर पा रहा थे कि यह फल कैसा है. कुछ दिन बीत गए तो राजा ने अपने सबसे विद्वान मंत्री को बुलाया और कहा आप इसे चखिए और बताइए स्वाद कैसा है! मंत्री ने एक आम उठाया, उसे कई हिस्सों में काटा, राजा की ओर तश्तरी बढ़ाते हुए कहा आप चखकर बताइए कैसा है! सब चकित होकर देखने लगे, क्योंकि किसी ने अब तक ऐसा प्रयास नहीं किया था. मंत्री ने कहा, मैं आपको यह नहीं बता सकता कि फल कैसा है. केवल आप ही इसे खाकर बता सकते हैं कि यह कितना स्वादिष्ट/ लाजवाब है. जैसे ही राजा ने उसे चखा, उन्होंने कहा, अरे वाह! यह तो बहुत स्वादिष्ट, मीठा और कमाल का फल है. अब समझ में आया आम क्या होता है!

बुजुर्ग, विद्वान मंत्री ने अपनी बात पूरी करते हुए कहा - बिना अपने अनुभव के हम चीजों के बारे में कोई ठोस राय नहीं बना सकते. जीवन की मिठास और कड़वाहट का बोध बिना अपने अनुभव हासिल नहीं हो सकता.

इसलिए अपने जीवन में सबसे पहले अपने अनुभव को रखना है उसके बाद दूसरों के सीखे को इसमें शामिल करना है.

दयाशंकर मिश्र
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First published: March 18, 2020, 10:05 PM IST
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