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#जीवनसंवाद : दूसरों के विचारों पर जीना! ‌

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: March 25, 2020, 11:17 PM IST
#जीवनसंवाद : दूसरों के विचारों पर जीना!    ‌
जीवन संवाद

JeevanSamvad: इस जीवन का जितना हिस्सा अब तक आपने जिया, वह है कितना मौलिक/कितना दूसरों के विचारों पर उपजा हुआ. इस पर सोचने का सही मोड़ है.

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  • Last Updated: March 25, 2020, 11:17 PM IST
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यह जो समय मिला है,भले ही विपत्ति से मिला है, लेकिन अगर इसका थोड़ा-सा भी हिसाब अपनी चेतना को जानने समझने में दिया जाए तो जीवन में बदलाव की कोंपले फूट सकती हैं. व्हाट्सएप और इंटरनेट पर बहुत सारी खबरों के बीच ढेर सारा भय भी है. मन में भरा जा रहा है, कुछ हो गया तो? यह जो एकांतवास है, उसे अंतर्यात्रा के लिए उपयोग कीजिए. यह जीवन का ऐसा मोड़ है, जिसमें थोड़ी सी सजगता से सृजन के फूल खिल सकते हैं!

इस जीवन का जितना हिस्सा अब तक आपने जिया, वह है कितना मौलिक/ कितना दूसरों के विचारों पर उपजा हुआ. इस पर सोचने का सही मोड़ है. बहुत से निर्णय को टालते रहते हैं. सोचते रहते हैं जल्दी क्या है, फिर कभी कर लेंगे. अभी समय नहीं आया है. कुछ ऐसे फैसले होते हैं, जिनके लिए मन में साहस की अधिक जरूरत होती है, योग्यता के मुकाबले. ऐसी तमाम चीजों पर हमारी राय अब वह नहीं रहने वाली जो कोरोनावायरस के भारत में आने से पहले थी. आप मेरी बात से कुछ सहमत/असहम हो सकते हैं. लेकिन मेरा यह प्रबल विश्वास है कि हमारी दुनिया हमेशा के लिए बदल चुकी है. हमारा समाज, रिश्ते, नौकरी सब कुछ बदलने जा रहा है. अब कुछ भी पहले की तरह नहीं होगा. अगर आप थोड़े प्रकृति वादी हैं, प्रकृति और उसके रहस्यों की ओर आपका रुझान है तो आपको इस पूरी आपदा को इस लिहाज से भी समझना होगा कि जब मनुष्य का विवेक प्रकृति के विरुद्ध होने लगता है तो वह स्वयं नियंत्रण में जुटने का काम करती है. यह संयोग है कि कोरोनावायरस 2020 में आया है, इससे ठीक 100 साल पहले (1918 से 1920) स्पेनिश फ्लू के चलते भारत में दो करोड़ से अधिक अधिक लोगों की मौत हुई थी. बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार महात्मा गांधी को 1918 में फ़्लू हो गया था. उस वक्त दक्षिण अफ्रीका से लौटे हुए उन्हें चार साल गुजर गए थे. गुजरात के उनके आश्रम में उन्हें स्पेनिश फ़्लू हुआ था.

उस वक्त महात्मा गांधी की उम्र 48 साल थी. फ़्लू के दौरान उन्हें पूरी तरह से आराम करने को कहा गया था. वह सिर्फ तरल पदार्थों का सेवन कर रहे थे. वो पहली बार इतने लंबे दिनों के लिए बीमार हुए थे.
यह फ्लू बॉम्बे (अब मुंबई) में एक लौटे हुए सैनिकों के जहाज से 1918 में पूरे देश में फैला था. हेल्थ इंस्पेक्टर जेएस टर्नर के मुताबिक इस फ्लू का वायरस दबे पांव किसी चोर की तरह दाखिल हुआ था और तेजी से फैल गया था.उसी साल सितंबर में यह महामारी दक्षिण भारत के तटीय क्षेत्रों में फैलनी शुरू हुई.



हिंदी के मशहूर लेखक और कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की पत्नी और घर के कई दूसरे सदस्य इस बीमारी की भेंट चढ़ गए थे.

इस समय यहां दोनों चीजों को सामने रखने का अर्थ केवल इतना है कि कुछ चीजें भले ही हमारी चूक से ना हों लेकिन विश्व नागरिक होने के नाते हमें उनकी कीमत चुकानी ही होती है. यह भी कि दुनिया में इस तरह के संकट नए नहीं है. ऐसे संकटों से मनुष्यता दो-चार होती रही है. गांधी ने उस वक्त जिस तरह स्पेनिश फ्लू की चपेट में आए देश को नई ऊर्जा दी. नैतिक बल दिया. गांधी के जीवन को ध्यान से देखने पर आप पाएंगे कि वह केवल राजनीतिक व्यक्ति नहीं हैं. जीवन के विविध क्षेत्रों में उनका योगदान है. उनके लिए आजादी सर्वोपरि नहीं है, वह हमें एक समग्र आजादी की ओर चलने को कहते हैं. उनके लिए नैतिकता, अहिंसा और सामाजिकता से बड़ा कुछ नहीं है. जो साहस और हिम्मत हमें उस वक्त गांधी से मिला वैसा ही कुछ समाज को इस महामारी से निपटने और उससे खड़ा होने के बात संभालने के लिए चाहिए.

इस पर विस्तार से चर्चा अगले अंकों में. आज केवल इतना ही कि जीवन जब अपने सबसे बड़े संकट से गुजर रहा होता है तो उसके संकेतों को बहुत ध्यान से देखने की जरूरत होती है. अपने सपने, जीवन के उद्देश्यों को समझने का यह सबसे अच्छा समय होता है. मैं इस दिशा में आगे बढ़ रहा हूं, आपसे भी यही चाहता हूं. शुभकामना सहित.

दयाशंकर मिश्र
ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com अपने सवाल और सुझाव इनबॉक्‍स में साझा करें:
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First published: March 25, 2020, 11:17 PM IST
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