#जीवनसंवाद : संकट कहां है!

जीवन संवाद

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#JeevanSamvad: मन विचित्र है. लेकिन उससे भी विचित्र है, मन को न समझने की हमारी ज़िद . हम कुछ कहां समझना चाहते हैं. हम बस भागना चाहते हैं उन हसरतों के पीछे जिससे हमें भीड़ में शामिल होने का सुख मिलता रहे.

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एक कहानी सुनाता हूं. एक दिन गांव में देर रात एक घर से आग-आग की आवाजें आने लगीं. सब तरफ से लोग मदद को दौड़े. पानी की बाल्टियां लेकर. मगर जहां से आवाज आती थी, वहां तो सब ठीक था. लोग उस टूटे-फूटे घर का दरवाजा खोल कर अंदर पहुंचे तो देखा, एक बुजुर्ग महिला बचाओ -बचाओ की पुकार लगा रही थी. वह लगातार कह रहीं थीं, आग- आग. लोगों ने कहा अरे, आग कहां है. आग तो कहीं नहीं. इस पर बुजुर्ग महिला ने कहा आग तो मेरे भीतर चल रही है.

अपनी नींद खराब होने से बेचैन हुए लोगों के पास उसकी बात सुनने का सब्र नहीं था. एक बच्चे ने प्यार से उससे पूछा क्या हुआ दादी आप कहां है. उसने कहा मेरा परिवार मुझे बुढ़ापे में छोड़ गया है इसलिए मेरे भीतर आग जलती है. मेरे भी तरफ प्रेम नहीं बचा. बस गुस्सा और कठोरता बढ़ती जा रही है. मैं इस आग की बात करती हूं, तो गांव वाले उस आग (बाहर वाली )की बात करते हैं. बच्चे ने बुजुर्ग महिला से कहा आज से मैं तुम्हारी सेवा करूंगा, मैं मदद करूंगा कि आपके मन की आग बुझ सके. कुछ महीने बाद धीरे-धीरे आसपास के लोगों ने महसूस किया कि अब बुजुर्ग महिला के घर से आए दिन आने वाले गुस्से और कठोर आवाजों में कमी आ रही है. असल में बच्चे की मेहनत रंग ला रही थी.

उस बच्चे ने समझ लिया था कि संकट (आग) कहां है. हमारा मन विचित्र है. लेकिन उससे भी विचित्र है, मन को ना समझने की हमारी ज़िद . हम कुछ कहां समझना चाहते हैं. हम बस भागना चाहते हैं उन हसरतों के पीछे जिससे हमें भीड़ में शामिल होने का सुख मिलता रहे. आग अगर भीतर लगी है तो वह बाहर पानी डालने से कैसे बुझेगी. उस बच्चे ने कितनी आसानी से समझ लिया क्योंकि उसके मन की स्लेट पर अभी तक कोई कहानी नहीं लिखी गई थी. हम जैसे जैसे बड़े होते जाते हैं, असल में हमारे मन बनावटी और झूठे होते जाते हैं. मैं यहां जानबूझकर झूठ शब्द का इस्तेमाल कर रहाा हूं क्योंकि हम खुद से ही झूठ बोलने लगते हैं. हमें क्या होना है! मेरी चाहते क्या हैं.


हमें क्या होना है! हम तय नहीं करते बल्कि दुनिया को तय करने देते हैं. यहीं से हम खुद को खोते जाते हैं. जब हमारा मन दूसरे का गुलाम होता जाएगा तो यह कैसे संभव है कि हम अपनी चेतना को स्वतंत्र रख पाएं. हमारी जरूरतें अपनी जगह हैं, लेकिन हमें नहीं भूलना चाहिए कि अगर हम खुद को नहीं बचा पाएंगे तो उस सुख से दूर चले जाएंगे, जिसके लिए हम चांद पर चढ़ने को तैयार रहते हैं.


इसलिए इस बात को समझना जरूरी है कि संकट कहां है. कोरोना के इस मुश्किल समय में खुद को जानने और समय रहते संभलने का अवसर भी है. जब जीवन संकट में होता है, उस वक्त हमारे निर्णय कहीं अधिक पवित्र और स्वभाव, अंतर्मन के निकट होते हैं. इसलिए स्वयं को निकट से जानने का यह सबसे अच्छा अवसर है. जीवन में कभी देर नहीं होती. हां हम देर से पहुंचते जरूर हैं. लेकिन फिर भी अंततः पहुंचना ही सबसे जरूरी होता है. इसलिए वह फैसले लीजिए जिनमें आप अपने सबसे अधिक निकट होते हैं.

दयाशंकर मिश्र
ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com अपने सवाल और सुझाव इनबॉक्‍स में साझा करें:
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