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#जीवनसंवाद: बासी मन!

News18Hindi
Updated: January 17, 2020, 9:31 AM IST
#जीवनसंवाद: बासी मन!
#जीवनसंवाद: बासी मन!

Jeevan Samvad: विरासत में मिले घर सरीखा मन भी बासी है. खानदानी संपत्ति तो संभव है, किसी काम आ जाए, लेकिन बासी मन किसी अर्थ का नहीं.

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  • Last Updated: January 17, 2020, 9:31 AM IST
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हम बासी रोटी से परिचित समाज रहे हैं. रसोई घर में जब तक फ्र‍िज की आमद नहीं हुई थी. बासी रोटी खाना एक सामान्‍य बात थी. विशेषकर गांव में, जहां चूल्‍हे से खाना बनता था. वहां सुबह जब तक चूल्‍हे में आग सुलगती, बासी रोटी बच्‍चों के पेट को राहत पहुंचा चुकी होती थी. यह तो बात हुई भोजन की. जहां बासी को कुछ शर्तों के साथ स्‍वीकार किया जाता था.

यह हमारी जीवनशैली थी. बात भोजन पर खत्‍म हो जाती तो अच्‍छा था, लेकिन ऐसा हुआ नहीं. अपने आसपास ध्‍यान से देखिए, तो ज्‍यादातर लोग वही मिलेंगे, जिनके मन बासी हैं. पुराने हैं. आपको बात अजीब लग सकती है कि मन में बासा/ताजा कहां से आ गया. लेकिन सच यही है कि हममें से अधिकांश लोगों के पास पुराना/बासी मन है. ठीक, उसी पुराने घर की तरह जो हमें विरासत में मिला.

विरासत में मिले घर सरीखा ही बासी मन भी है. खानदानी संपत्ति तो संभव है, किसी काम आ जाए, लेकिन बासी मन किसी काम का नहीं. यह हमें उन्‍हीं खूटों से बांधे रखता है, जिनसे न बंधे होने के बाद भी ऊंट खुद को बंधा हुआ महूसस करता है.

अगर आपके सोचने, नि‍र्णय लेने का तरीका एकदम वैसा ही है, जैसे आपके दादा, पिता और खानदान का था, तो निश्‍चित रूप से आपके पास वही बासी मन है.
जिस तरह से वह चीजों के बारे में निर्णय करते थे. जीवन के बड़े मौके पर फैसले करते थे, अगर आप भी उसी तरह से कर रहे हैं तो यकीन मानिए. आपने पुराने मन को अब तक गिराया नहीं.

मकान पुराना हो जाता है, तो उसे तोड़कर नया बनाते हैं. गाड़ी पुरानी हुई तो नई आएगी. लेकिन मन, वह तो एकदम से पुराना, जर्जर हो चला है. अब गिरा, तब गिरा. इतने के बाद भी आपको यह एहसास ही नहीं कि मन खंडहर हो गया है. खंडहर की देखभाल अलग तरह से की जाती है, नए मकान की अलग तरह से.


हमारे मन खंडहर सरीखे हैं. जर्जर! इसे गिराए बिना हम नया मन कैसे बनाएंगे! जब मन ही पुराना है तो हम नए कैसे हुए. हम थोड़ा-थोड़ा हासिल करके आत्‍ममुग्‍ध समाज बन गए हैं. खुद में डूबे हुए. पुराने, बासी मन के रंगे में रमे हुए.
स्त्रियों के बारे में हमारे विचार कैसे हैं? शिक्षा, जाति, विवाह, दहेज पर हमारे विचार क्‍यों नहीं बदले. कहां से बदलेंगे. कैसे बदलेंगे! जब मन जर्जर, खंडहर है, तो उसमें ताजी हवा कहां से आएगी! इसलिए अपने मन को टटोलना जरूरी है. उसे समझना जरूरी है. बिना उसे नया किए, बिना बदले हम नहीं बदल सकते.


खुद को बदलने के लिए लोग छुट्टियों पर जाते हैं. मैदान से पहाड़, पहाड़ से मैदान पर आते हैं. गर्मी से सर्दी, सर्दी से गर्मी की ओर भागते रहते हैं. खुद को जिंदगी से हो रही ऊब से मुक्‍त करना चाहते हैं. जगह बदलने से, हवा बदलने से एक ताजा झोंका तो हासिल किया जा सकता है, लेकिन स्‍थायी रोशनी, बिना रोशनदान के नहीं मिल सकती.

इसलिए, जब कभी नए पर संवाद हो तो ध्‍यान रखा जाए कि मन कौन सा है! उसकी सेहत के लिए आपने क्‍या नया किया! मन पर पुराने की परत इतनी गहरी है कि उसे उतारे बिना नया आएगा नहीं. तनाव, गहरी उदासी, चिंता और डर इस पुराने/बासी मन की देन हैं. इनसे मुक्‍त होने के लिए नए मन से कम कुछ नहीं चलेगा.

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
Network18 एक्सप्रेस ट्रेड टावर, 3rd फ्लोर, A विंग
सेक्टर 16 A, फिल्म सिटी, नोएडा (यूपी)
ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com अपने सवाल और सुझाव इनबॉक्‍स में साझा करें:
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First published: January 16, 2020, 12:16 PM IST
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