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#जीवनसंवाद : मन के जिरह-बख्तर!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: December 2, 2019, 9:49 AM IST
#जीवनसंवाद : मन के जिरह-बख्तर!
जीवन संवाद

Jeevan Samvad: आपके पास मन के 'जिरह-बख्तर' नहीं होंगे तो खुद को बचाना मुश्किल होता जाएगा. तेजी से बदलती दुनिया में चुनौतियों के लिए अपने मन को तैयार करना भी उतना ही जरूरी है.

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  • Last Updated: December 2, 2019, 9:49 AM IST
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जब हर तरफ से ऐसी खबरें आ रही हो जो मन को खट्टा करती हों, तो सचमुच संकट बढ़ जाता है. मन विचलित, दुखी होने लगता है. ऐसा लगता है, मानिए, सब कुछ खत्म होने वाला है. ऐसे समय में बहुत जरूरी है कि हम अपने भीतर मजबूती से बैठ जाएं. पुराने जमाने में योद्धाओं के पास जिरह-बख्तर हुआ करते थे. यह एक प्रकार का अति सुरक्षित कवच था, जिसमें शत्रुओं के प्रहार असर नहीं करते थे. इस समय हम जैसी मुश्किल चीजों के चक्रव्यूह में उलझे हुए हैं, हमारे लिए बहुत जरूरी है कि हमारे मन के जिरह-बख्तर (कवच) बहुत मजबूत हों.

मन का कवच मजबूत रहने से हम दुनिया का कोई भी संकट आसानी से सह सकते हैं. संकट, उथल-पुथल का सामना करने की शक्ति बाहर से नहीं, भीतर की शांति से आती है. गांधी कहते हैं, संसार की उथल-पुथल और झंझावात में रहते हुए भी जो मनुष्य अपनी मानसिक शांति कायम कर सके, वही सच्चा इंसान है. यह बात सुनने में बहुत सरल लगती है. लेकिन जीवन के अभ्यास में यह बहुत ही मुश्किल है. हमारा मन बार-बार आशंका की ओर दौड़ने लगता है. हम भूल जाते हैं कि दुनिया में ऐसा बहुत कुछ है जो हमारे वश में नहीं है.

आपकी नौका बीच समंदर में तूफ़ान में फंसी है, तो आप क्या करेंगे? आपके घबराने से कुछ नहीं होने वाला. अब असल में जो कुछ करना है, समंदर को करना है. आपको तो बस साहस और हौसला रखना है. यही बात पूरी तरह हमारी जिंदगी पर लागू होती है. आप निजी क्षेत्र में हैं या फिर सार्वजनिक क्षेत्र में, इससे बहुत फर्क नहीं पड़ता. अंततः निर्णय करने वाले लोग 'दूसरे' ही हैं. कंपनियां आपसे पूछ कर फैसले नहीं करती. आप फैसलों को मानने के लिए बहुत हद तक विवश होते हैं. ऐसे में अगर आप हर समय बदलने वाली दुनिया में भीतर से मजबूत नहीं होंगे.

आपके पास मन के 'जिरह-बख्तर' नहीं होंगे तो खुद को बचाना मुश्किल होता जाएगा. नौकरियों का मिज़ाज का हर दिन बदलता जा रहा है. जैसी नौकरी आज है, दस बरस पहले वैसी नहीं थी. जैसी आज है तीन बरस बाद वैसी नहीं रहेगी. बहुत संभव है कि तीन की जगह यह बात पांच बरस बाद सही साबित हो लेकिन इतना तय है कि चीजें बहुत तेजी से बदल रही हैं. इसलिए तेजी से बदलती दुनिया में चुनौतियों के लिए अपने मन को तैयार करना भी उतना ही जरूरी है.


भीतर से प्रसन्न रहना है. मन में ठोस, गहरा प्रेम बहुत जरूरी है. इसके बिना हमारा मन उदार, अनुरागी नहीं हो पाएगा. शुष्क मन से हम मुश्किलों का सामना नहीं कर सकते. इसलिए, मन को आत्मीयता, स्नेह का कवच देना जरूरी है. ऐसे लोगों को अपने आसपास रखिए, जिनका साथ आपको कोमल और ठोस बनाए रखने में मददगार हो. आशा की कोंपले हर हाल में मन में फूटनी चाहिए. इनसे ही जीवन ऊर्जावान है. अपनी मुश्किल को दूसरों जितना ही बड़ा मानना है. इससे मन बहुत हल्का रहता है. जैसे सबको रास्ता मिलता है, हमको भी वैसे ही मिलेगा. एक पल के लिए भी मन को इस भाव से दूर नहीं करना है. इसे अभ्यास की तरह अपनाइए, यह आपको वैसा ही लाभ देगा जैसा चक्रवृद्धि ब्याज आपके मूलधन को देता है!

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: December 2, 2019, 9:49 AM IST
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