#जीवनसंवाद : आपके जैसा होना!

#जीवन संवाद

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#JeevanSamvad: हम आसानी से उन चीज़ों की ओर खिंचे चले जाते हैं जो हमें लुभावनी लगती हैं. जबकि बहुत संभव है कि वह असल में लुभावनी न हों.

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हम दूसरे की तरह होना चाहते हैं, हमारा सबसे बड़ा दुख यही है. सबसे बड़ी इच्‍छा यही है कि काश! मैं आपकी तरह होता! जिसका रंग/ढंग/ऐश्‍वर्य हमें लुभाता है, हम उसके सरीखे होना चाहते हैं. मन के भीतर तुलना का वजन बढ़ते ही सारे गुण एक तरफ होने लगते हैं. हम सबकुछ भूलकर दूसरे की आरजू करने लगते हैं.

त्‍वचा के रंग को लेकर भेदभाव हमारे बीच नया नहीं है. संसार में इसे लेकर एक से बढ़कर एक भ्रम और संघर्ष हैं. इसका ही परिणाम है कि एक खास किस्‍म की त्‍वचा के प्रति हमारा गहरा आकर्षण है. संभव है कि आपको यह बात थोड़ी विचित्र लगे लेकिन अपने अनुभव के आधार पर मुझे यह कहने में संकोच नहीं कि बहुत नजदीकी रिश्‍तों में भी त्‍वचा के प्रति‍ भेदभाव हमारे देश में सामान्‍य है.

लंबे समय से एक खास किस्‍म की त्‍वचा, देह के आकार-प्रकार ने हमारे मन के भीतर जगह बना ली है. जिसके जैसा होने का आग्रह मन के भीतर हो लेकिन वैसा हुआ न जा सके तो इससे कुंठा की परतों का मन में जमना सहज होता जाता है. हमें अपने आसपास जो भी सफल दिखता है, हम उसके जैसे होने की तमन्‍ना कर बैठते हैं. यह तुलना मन को अक्‍सर बेचैनी, दुख और कुंठा की ओर धकेलती है.


इस समय युवाओं के जीवन में सबसे अधि‍क उथल-पुथल का कारण तुलना के भंवर में उलझे रहना है. हम रिश्‍तों को प्रोडक्‍ट की तरह संभालने लगे हैं. प्रोडक्‍ट को रिश्‍तों की तरह. हम आसानी से उन चीज़ों की ओर खिंचे चले जाते हैं जो हमें लुभावनी लगती हैं. जबकि बहुत संभव है कि वह असल में लुभावनी न हों.
वह हमें लुभाती इसलिए हैं कि क्‍योंकि हम जिन चीजों, रिश्‍तों से घिरे हैं, उन पर उनका गहरा असर है. इसलिए, हर तरफ से हमारे ऊपर इस बात का दबाव पड़ने लगता हैं उस ओर चलो/उसे चुनो जो दूसरों ने चुना है.


ज़ेन साधु के पास एक श‍िष्‍य आया. उसकी आंखों में आंसू थे. आवाज़ एकदम भारी. माथे पर चिंता की लकीरें. उसने गुरु से कहा, ‘मैं आपकी तरह पवित्र, शुद्ध आचरण और मन वाला होना चाहता हूं. लेकिन नहीं हो पा रहा हूं. मैंने बहुत कोशिश की लेकिन यह संभव नहीं. मैं इससे बहुत अधिक परेशान हूं.‘
ज़ेन साधु ने गहरे स्‍नेह के साथ उसे बाहर आने का इशारा किया. उन्‍होंने कुटिया के बाहर खड़े दो पेड़ों की ओर इशारा किया. इन्‍हें देखो, एक इतना बड़ा कि मानो बादल से कानाफूसी करता है. पक्षि‍यों के घोंसलों से यहां हर समय सुरम्‍य संगीत रहता है. दूसरा इस बड़े के मुकाबले एकदम छोटा है. लेकिन इसके फल बहुत मीठे हैं. सबको सुलभ हैं.

मैंने इन दोनों को कभी एक-दूसरे से लड़ते नहीं देखा. एक-दूसरे से उलझते नहीं देखा. इनको एक-दूसरे की तुलना से दुखी होते नहीं देखा. यह न तो तुलना में उलझते हैं, न इनके भीतर अपने श्रेष्‍ठ होने/दूसरे के कमतर होने का कोई भाव है. यह दोनों जैसे हैं, असल में वह वैसे ही हैं. अपनी धुन में. वह अपने समय को श्रेष्‍ठता के पेंच में नहीं खोना चाहते.

साधु ने अपनी बात समाप्‍त करते हुए कहा, ‘तुम, तुम हो. मैं, मैं हूं. यह संसार की सबसे सरल बात है. लेकिन दुनिया में सबसे अधिक लोग इसमें ही उलझे हुए हैं.’


प्रकृति के पास मन के अधिकतर सवालों का जवाब है. सरल भाषा में. लेकिन हम अपनी लालसा, इच्‍छा और दूसरे की नकल करने में ऐसे खोए हैं कि हमें प्रकृति‍ से संवाद, उसकी ओर देखने, उससे सीखने की फुरसत नहीं. समय की यह कमी हमारी जीवनशैली, हमारे जीवन को सबसे अधिक प्रभावित कर रही है.

दयाशंकर मिश्र
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