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आज ही के दिन आखिरी बार गोमो में देखे गए थे सुभाष चंद्र बोस! जानिए नेताजी से जुड़ा यह किस्सा

आज ही के दिन आखिरी बार गोमो में देखे गए थे सुभाष चंद्र बोस! जानिए नेताजी से जुड़ा यह किस्सा

गोमो में नेताजी सुभाषचंद्र बोस की निष्क्रमण यात्रा मनाई जाती है.आखिरी बार नेताजी यहीं देखें गए थे.

गोमो में नेताजी सुभाषचंद्र बोस की निष्क्रमण यात्रा मनाई जाती है.आखिरी बार नेताजी यहीं देखें गए थे.

 Netaji Subhash Chandra Bose: जहां पूरे देश में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 125वीं जयंती मनाई जा रही है. वहीं दूसरी ओर गोमो में नेताजी सुभाषचंद्र बोस की निष्क्रमण यात्रा मनाई जाती है. बताया जाता है कि सुभाष चंद्र बोस अपने भतीजे व अपने परिवार के अन्य लोगो के साथ काले रंग की बेबी आंस्ट्रीकन कार से गोमो पहुंचे थे. इसके बाद  17 जनवरी की रात गोमो स्टेशन से गंतव्य के लिए रवाना हुए थे. यह यात्रा उनकी अंतिम यात्रा मानी जाती है. महानिष्क्रमण दिवस के मौके पर स्थानीय लोगों द्वारा 17 जनवरी की रात कालका मेल के चालक, मैनेजर और स्टेशन प्रबंधक को बुकें देकर सम्मानित किया जाता है. 

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संजय गुप्ता

धनबाद.  झारखंड के धनबाद जिले के गोमो से स्वतंत्रता सेनानी और आजाद हिंद फौज के संस्थापक नेताजी सुभाष चंद्र बोस ( Netaji Subhash Chandra Bose) का गहरा नाता है. नेताजी आखिरी बार इसी गोमो में देखे गए थे. इसके बाद फिर कभी नेताजी सुभाष चंद्र बोस को किसी ने नहीं देखा. यही कारण है धनबाद जिला के गोमोवासियों के रोम-रोम में नेताजी बसे हैं. गोमोवासियों का नेताजी से विशेष लगाव है. इसीलिए यहां के रेलवे स्टेशन का नाम भी सुभाष चंद्र बोस के नाम पर ही रखा गया है. जहां पूरे देश में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 125वीं जयंती मनाई जा रही है, वहीं दूसरी ओर गोमो में नेताजी सुभाषचंद्र बोस की निष्क्रमण यात्रा मनाई जाती है.

क्या है निष्क्रमण दिवस

महान स्वतंत्रता सेनानी का अतीत नेताजी सुभाष चंद्र बोस का अतीत गोमो स्टेशन से जुड़ा है. अंग्रेजी सिपाहियों ने 2 जुलाई 1940 को नेताजी को हॉलवेल मूवमेंट के दौरान गिरफ्तार कर प्रेसिडेंसी जेल भेज दिया था. वह अपनी गिरफ्तारी से नाराज होकर जेल में ही अनशन पर बैठ गए, इससे उनका स्वास्थ्य लगातार खराब होता जा रहा था. तब अंग्रेजों ने उन्हें इस पर शर्त रिहा किया कि तबीयत ठीक होने पर उन्हें पुनः गिरफ्तार कर लिया जाएगा. हालांकि इससे भी अंग्रेजों का मन नही भरा तो उन्होंने एल्गिन रोड स्थित नेताजी के आवास पर पहरा लगा दिया गया था.

उक्त मामले की सुनवाई  27 जनवरी 1941 को होनी तय थी. नेताजी को इस मामले की भनक लग गई  थी कि इस मामले में उन्हें सजा होने वाली है. नेताजी अंग्रेजी सिपाहियों की आंखों में धूल झोंक कर बंगाल की सीमा से भागने में सफल रहे. उनके कोलकाता से भागने की खबर फैलने के बाद अंग्रेजी हुकूमत के बीच खलबली मच गई थी.

वह अपने भतीजे व अपने परिवार के अन्य लोगों के साथ काले रंग की बेबी आंस्ट्रीकन कार से गोमो पहुंचे थे. इसके बाद  17 जनवरी की रात गोमो स्टेशन से गंतव्य के लिए रवाना हुए थे. यह यात्रा उनकी अंतिम यात्रा मानी जाती है. चूंकि इस यात्रा के बाद से कभी नेताजी अंग्रेजों के हाथ नहीं आए उनके जिंदगी का शेष भाग कब, कहां और कैसे गुजरा इस बात को लेकर तरह-तरह की चर्चा आज तक बनी हुई है.

लालू प्रसाद यादव ने बदला स्टेशन का नाम 

रेलमंत्री रहते हुए लालू प्रसाद यादव ने गोमो स्टेशन का नाम बदलकर नेताजी सुभाष चंद्र बोस जंक्शन गोमो रखा गया था. आज गोमो रेलवे के सभी कार्यालयों में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की तस्वीर लगी है.

आज नेताजी गोमो वासियों के रग-रग में समाए हैं. निष्क्रमण दिवस के मौके पर स्थानीय लोगों द्वारा 17 जनवरी की रात कालका मेल के चालक, मैनेजर और स्टेशन प्रबंधक को बुकें देकर सम्मानित किया जाता है. साथ ही कालका मेल के सभी बोगियों में नेताजी की तस्वीर और महानिष्क्रमण यात्रा युक्त स्टिकर लगाई जाती है.

नेताजी सुभाष चंद्र बोस जंक्शन के प्लेटफार्म संख्या एक और दो के बीच उनकी प्रतिमा पर सैकड़ों लोग अपने श्रद्धा सुमन के पुष्प अर्पित करते हैं. आज नेताजी के नाम से दो स्कूल का संचालन किया जा रहा है जबकि है एक कॉलोनी का नाम सुभाष नगर रखा गया है.

वहीं गोमो की युवती नेहा चौधरी द्वारा गोमो स्टेशन और नेताजी की पेंटिंग बनाई गई है जिसमें उन्हें चादर लपेटे दिखाया गया है. टोपी पहने नेताजी की तस्वीर हर जगह देखी जा सकती है लेकिन ऐसी तस्वीर बहुत कम देखने के लिए मिलती है. यही सोचकर यह तस्वीर बनाई गई है. वहीं स्थानीय का भी मानना है कि नेताजी की अंतिम यात्रा इसी गोमो में था.

Tags: Netaji Subhash Chandra Bose, Subhash Chandra Bose

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