Jharkhand : खाट पर लादकर मरीज को लाए गांव, कोरोना के चलते नहीं मिला इलाज तो बैरंग लौटे आदिवासी

झारखंड के एक गांव की तस्वीर, जहां के लोग इस तरह चारपाई पर मरीज़ों को लादकर 5 किलोमीटर दूर अस्पताल ले जाने पर मजबूर हैं.

झारखंड के एक गांव की तस्वीर, जहां के लोग इस तरह चारपाई पर मरीज़ों को लादकर 5 किलोमीटर दूर अस्पताल ले जाने पर मजबूर हैं.

ये तस्वीरें साफ बताती हैं कि 21वीं सदी के भारत का ​एक​ हिस्सा अभी एक सदी पीछे है. यहां संपर्क के रास्ते नहीं हैं इसलिए आदिवासी खाट पर मरीज़ों को इलाज कराने के लिए ले जाने पर मजबूर हैं.

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बोकारो. एक तरफ ज़िले की पहचान स्टील​ सिटी के तौर पर है, तो दूसरी तरफ एक सदी पीछे का जीवन जीने वाले गांव भी इस ज़िले को परिभाषित कर रहे हैं. एक इलाका ऐसा है जहां उग्रवाद का असर बेतहाशा है, लेकिन झारखंड के अलग राज्य बन जाने के बावजूद यहां बुनियादी सुविधाएं तक नहीं हैं. ऐसा पहुंच मार्ग तक नहीं है, जिससे यहां आना जाना आसान हो. बारिश में तो यह द्वीप हो ही जाता है. इस प्रखंड से एक तस्वीर और कहानी फिर आई है कि यहां लोग कैसे स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित हैं. एक बुज़ुर्ग महिला को खाट पर लादकर ले जाया गया, लेकिन महामारी के दौर की असंवेदनशीलता के चलते अस्पताल पहुंचना तब भी मुमकिन नहीं हो सका.

गोमिया प्रखंड की अति उग्रवाद प्रभावित क्षेत्र सिंयारी पंचायत के संताली बहुल गांव असनापानी के ग्रामीण आज भी मूलभूत सुविधाओं को तरस रहे हैं. यहां रहने वाले आदिवासी सड़क के अभाव में मरीज़ों को आज भी खाट पर इलाज कराने के लिए ले जाने पर मजबूर हैं. यही नहीं, इस इलाके में सड़क के साथ ही, बिजली शिक्षा का भी अभाव है.

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नहीं मिला इलाज, मिलता भी नहीं है
बीमार वृद्धा बंधनी देवी को इलाज के लिए खाट पर लादकर पांच किलोमीटर दूर ग्रामीण दनिया ले गये, ताकि वहां से इलाज के लिए रामगढ़ ले जाया जा सके. लेकिन, यह भी संभव नहीं हुआ. कोरोना के डर से किसी ने सहयोग नहीं किया, तो ग्रामीण मरीज वृद्धा को वापस गांव ले गये. अब जड़ी-बूटी से इलाज किया जा रहा है और जानकारी मिली है कि वो ठीक हो रही है.

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असनापानी गांव तक सड़क, बिजली और शिक्षा की पहुंच आज भी नहीं है.

क्या ये 21वीं सदी के इलाके हैं?



ग्रामीणों का कहना है जब किसी महिला को प्रसव पीड़ा होती है, तब भी इसी प्रकार महिलाओं को खाट पर लादकर उबड़ खाबड़ पगडंडियों और जंगली रास्तों से ले जाना पड़ता है. गोमिया प्रखंड के सुदूर उग्रवाद प्रभावित गांवों में जहां पहुंच मार्ग तक नहीं हैं, वहीं अब भी लोग लालटेन और ढिबरी से घरों में उजाला करते हैं.

बताते चलें कि असनापानी गांव में 15 आवास संताली परिवार के हैं, जो पहाड़ी में हैं. स्कूल तो छोड़िए, यहां के ग्रामीण अपने बच्चों के लिए एक आंगनबाड़ी केन्द्र की मांग लंबे अरसे से कर रहे हैं. फिलहाल उनके बच्चे तीन किलोमीटर दूर बिरहोर डेरा गांव के स्कूल में जाते हैं.

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