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राधेश्‍याम मुंडा की कहानी: बीमारी ने नौकरी छुड़वाई तो शुरू की खेती, अब इंजीनियर बेटे को दे रहे 15000 वेतन

राधेश्‍याम मुंडा की कहानी: बीमारी ने नौकरी छुड़वाई तो शुरू की खेती, अब इंजीनियर बेटे को दे रहे 15000 वेतन

Bokaro News: राधेश्‍याम मुंडा ने 15 एकड़ जमीन पर मौसमी सब्‍जी की खेती कर लाखों की कमाई कर रहे हैं. (न्‍यूज 18 हिन्‍दी/मृत्‍युंजय कुमार)

Bokaro News: राधेश्‍याम मुंडा ने 15 एकड़ जमीन पर मौसमी सब्‍जी की खेती कर लाखों की कमाई कर रहे हैं. (न्‍यूज 18 हिन्‍दी/मृत्‍युंजय कुमार)

आत्‍मनिर्भर भारत की बेमिसाल कहानी: किडनी की बीमारी के चलते राधेश्‍याम मुंडा को BSL की नौकरी छोड़नी पड़ी थी. राधेश्‍याम को जब लग रहा था कि जिंदगी हर दिन उनसे दूरी बनाती जा रही है, तभी उन्‍होंने अपने अदम्‍य साहस से न केवल मौत से जंग जीती, बल्कि आज के दिन वह अपने इंजीनियर बेटे को 15,000 रुपये प्रति महीने की नौकरी भी दे रहे हैं. पढ़ें एक आम इंसान के हजारों-लाखों लोगों के लिए मिसाल बनने की कहानी...

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    रिपोर्ट – मृत्‍युंजय कुमार

    बोकारो. अगर हौसला बुलंद हो तो न केवल मौत से जंग जीती जा सकती है, बल्कि मिसाल भी बना जा सकता है. कुछ ऐसी ही कहानी है किडनी की बीमारी के कारण BSL की नौकरी छोड़ने वाले राधेश्‍याम मुंडा की. राधेश्‍याम मुंडा बोकारो के सेक्‍टर-9 में रहते हैं. उन्‍होंने आत्‍मविश्‍वास और साहस से बीमारी पर विजय प्राप्‍त की और अब खेती के जरिए दर्जनों लोगों को नौकरी भी दे रहे हैं. राधेश्‍याम ने अपने इंजीनियर बेटे को भी खेतों में 15,000 रुपये प्रति महीने की नौकरी दे रखी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आत्‍मनिर्भर भारत अभियान से प्रेरित होकर राधेश्‍याम आज लाखों लोगों के लिए प्रेरणास्रोत बन चुके हैं. वह अपने निवास स्थान से लगभग 25 किलोमीटर दूर जरीडीह प्रखंड के पराटांड गांव में 15 एकड़ जमीन पर सब्जी की खेती कर लाखों रुपए की कमाई कर रहे हैं.

    वर्ष 2016 में राधेश्याम मुंडा किडनी रोग से ग्रस्त हो गए थे. विवशता में उन्हें बीएसएल की नौकरी छोड़नी पड़ी थी. नियमानुसार उनके बेटे (अजीत कुमार) को नौकरी दी गई. इस बीच राधेश्‍याम दवा के सहारे जीवन-यापन करने लगे. जब ऐसा लग रहा था कि उनकी जिंदगी हर बीतते दिन के साथ अंतिम पड़ाव की ओर अग्रसर है, तभी उन्‍होंने कुछ नया करने का सोचा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आत्मनिर्भर भारत की बात कही थी. बस यही बात राधेश्याम मुंडा के जेहन में बैठ गई. नरेंद्र मोदी की बात से प्रभावित होकर मुंडा ने वर्ष 2019 में 2.5 एकड़ जमीन लीज पर लेकर खेतीबारी का काम शुरू किया. शुरूआत में उन्‍होंने 2.5 एकड़ जमीन पर कद्दू लगाया था. साल 2020 में खेती से उन्‍हें 5 लाख रुपए का मुनाफा हुआ. अब राधेश्‍याम 15 एकड़ जमीन पर सब्‍जी की पैदावार कर रहे हैं.

    कोरोना काल में आत्‍मनिर्भरता की ओर अग्रसर

    कोरोना काल में जब व्यवसाय और नौकरी पर खतरा मंडरा रहा था. बड़ी तादाद में लोग बेरोजगार हो रहे थे, तब राधेश्‍याम मुंडा ने आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ना शुरू किया था. मुंडा खेती में इस तरह रम गए कि अपने बेटों को भी इससे जोड़ लिया. पंजाब में इंजीनियरिंग कर रहे मंझले बेटे संजीत कुमार को बोकारो बुला लिया. राधेश्‍याम ने बेटे संजीत को घर में ही प्रति महीने 15 हजार रुपये की नौकरी दी. इसी तरह छोटे बेटे मंजीत कुमार को भी उन्‍होंने नौकरी दी. राधेश्‍याम छोटे बेटे को 10 हजार रुपए प्रति महीने दे रहे हैं.

    बैंगन, चना, गोभी आदि की खेती

    उन्होंने 15 एकड़ में बैंगन, चना, गोभी और मौसमी सब्जी लगाई है. मुंडा ने बताया कि खेती में बहुत स्कोप है, लेकिन मेहनत करनी पड़ती है. बोकारो जिले में मिर्च और बैंगन बाहर से न आए, इसी सपने के साथ खेती की जा रही है.

    Radheyshyam Story

    राधेश्‍याम मुंडा ने खेती की शुरुआत ढाई एकड़ जमीन से की थी. (न्‍यूज 18 हिन्‍दी/मृत्‍युंजय कुमार)

    50 लोगों को दी नौकरी

    राधेश्‍याम मुंडा ने 50 लोगों को नौकरी दे रखी है. गोला से कृषि विशेषज्ञ लालू करमाली को विशेष पैकेज पर काम दिया गया है. इन्हीं के देखरेख में खेती होती है. इसके अलावा 40 लोगों की टीम खेतीबारी का काम देखते हैं. मुंडा ने बताया कि हर एकड़ जमीन पर 1 ट्रैक्टर गोबर डाला गया है. गोबर से खेत को प्राकृतिक खाद मिली. इससे उत्पादन अच्छा हुआ. मुंडा की कोशिश जैविक खेती करने की है, लेकिन विशेष परिस्थिति में कीटनाशक का प्रयोग करते हैं. राधेश्याम मुंडा ने कहा कि उन्‍हें सरकारी पैसे की जरूरत नहीं है. उन्‍हें सिर्फ संसाधन उपलब्ध करा दिया जाए तो वह 200 लोगों को रोजगार देने के साथ ही बोकारो में लोगों को ताजी सब्जियां उपलब्ध करा सकते हैं.

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    राधेश्‍याम को माता-पिता का भी पता नहीं

    राधेश्याम मुंडा मूल रूप से लातेहार के रहने वाले हैं. जब वह मात्र 8 साल के थे तो बीएसएल के अधिकारी आरएन सिंह चौहान उन्हें लेकर बोकारो आ गए थे. मुंडा को अपने माता-पिता का नाम तक नहीं मालूम. वह आरएन सिंह चौहान को ही सबकुछ मानते रहे. आरएन सिंह ने अंतिम समय में उन्हें बताया था कि वह उनके पुत्र नहीं हैं. हालांकि, उनकी देखरेख और पालन-पोषण में ही मुंडा को बीएसएल में नौकरी मिली. कभी पहचान की तलाश करने वाले मुंडा खेती के कारण क्षेत्र में नई पहचान बना रहे हैं.

    ‘झारखंड के लिए आदर्श’

    भाजपा किसान प्रकोष्ठ के प्रदेश महामंत्री अर्जुन सिंह ने राधेश्याम के प्रयास की सराहना की और कहा कि राधेश्याम बोकारो जिले के लिए ही नहीं, बल्कि झारखंड के लिए आदर्श हैं. जिस प्रकार से बीमारी के बाद भी वह लोगों को रोजगार देते हुए बंजर भूमि में खेती कर रहे हैं, उनके इस काम को पूरे राज्य में पार्टी एक मॉडल के रूप में प्रस्तुत करेगी. अर्जुन सिंह ने रधेश्‍याम को हर संभव मदद दिलाने की बात भी कही है.

    Tags: Atmnirbhar Bharat, Bokaro news, Jharkhand news, Prime Minister Narendra Modi

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