8 साल में खंडहर में तब्दील हो गये बुनकर शेड, कारीगरों की किस्मत पर लगा सरकारी ग्रहण

देवघर में 8 साल पहले झारक्राफ्ट ने 7 बुनकर शेड का निर्माण कराया था.
देवघर में 8 साल पहले झारक्राफ्ट ने 7 बुनकर शेड का निर्माण कराया था.

देवघर जिले में स्थानीय कारीगरों (Artisan) को रोजगार देने के लिए 7 बुनकर शेडों (Weaver sheds) का निर्माण कराया गया था. लेकिन सरकारी उदासिनता के चलते 8 सालों में ये खंडहर में तब्दील हो गये हैं.

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देवघर. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी (PM Narendra Modi) के वोकल फ़ॉर लोकल के आह्वान के बाद शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के हस्तशिल्प से जुड़े कारीगरों के मन में उनके द्वारा निर्मित वस्तुओं को एक नई पहचान मिलने की उम्मीद जगी है. ऐसे स्थानीय कारीगर (Artisan) अपने हुनर के जरिये अपने लिए रोजगार तलाशने को लेकर काफी उत्साहित भी हैं. लेकिन देवघर में सरकार और स्थानीय प्रशासन की उदासीनता के कारण ऐसे कारीगरों की उम्मीद पर पानी फिरता दिख रहा है.

सरकारी उदासिनता की भेंट चढ़ गये बुनकर शेड 

देवघर के बिरनियां गांव में लगभग आठ वर्ष पहले झारक्राफ्ट द्वारा बुनकर शेड का निर्माण कराया गया था. उद्देश्य स्थानीय कारीगरों को स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध कराना था. कुछ दिनों तक बुनकर शेड चला भी और खासकर  स्थानीय महिला कारीगरों ने इससे जुड़कर अपने लिए रोजगार के अवसर भी विकसित किए. लेकिन थोड़े ही दिन के बाद यह बुनकर शेड सरकारी और विभागीय उदासीनता का शिकार हो गया. अब देखते ही देखते यह खंडहर में तब्दील हो गया है.



इस बुनकर शेड के बंद हो जाने से कई स्थानीय कारीगर बेरोजगार हो गए. कई तो वैकल्पिक रोजगार की तलाश में दूसरी जगहों पर पलायन कर गए. स्थानीय लोग इसे फिर से खोलने की मांग कर रहे हैं.
400 लोगों को मिला हुआ था रोजगार

देवघर जिले में इस तरह का बुनकर शेड 7 जगहों पर निर्माण कराया गया था. मधुपुर में 3, सारवां, देवीपुर, सारठ और मोहनपुर प्रखंड क्षेत्र में 1-1 बुनकर शेड बनाये गये. इसके माध्यम से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से 450 लोगों को रोजी-रोटी मिलती थी. ये लोग रोजाना 200 से 250 रुपये तक कमा लेते थे. लेकिन बिरनियां स्थित बुनकर शेड की तरह ही सभी शेड अब धीरे-धीरे खंडहर में तब्दील होने लगे हैं.

डीसी ने दोबारा चालू कराने का दिलाया भरोसा 

हालांकि जिले के उपायुक्त कमलेश्वर प्रसाद सिंह ने उद्योग विभाग से समन्वय स्थापित कर इसे फिर से शुरू करने की बात कही है. इस कोरोना काल में अगर ये खुल जाते हैं, तो स्थानीय स्तर पर कई लोगों को रोजगार मिल जाएगा. उन्हें वापस शहर की तरफ पलायन नहीं करना पड़ेगा.
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