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न सड़क, न गली, बांस का पुल पार कर इन आधा दर्जन गांवों में पहुंचते ग्रामीण

न सड़क, न गली, बांस का पुल पार कर इन आधा दर्जन गांवों में पहुंचते ग्रामीण

झारखंड सरकार कई मंचों से आदिवासियों के लिए विकास के प्रयास का दावा ठोकती नजर आती है. दूरदराज इलाकों में बसे आदिवासियों के कल्याण के लिए कई तरह की योजनाएं फाइलों पर दौड़ रही हैं.

    झारखंड सरकार कई मंचों से आदिवासियों के लिए विकास के प्रयास का दावा ठोकती नजर आती है. दूरदराज इलाकों में बसे आदिवासियों के कल्याण के लिए कई तरह की योजनाएं फाइलों पर दौड़ रही हैं. पर सारे दावे और सारी योजनाएं बांस के उस छोटे से पुल पर दम तोड़ती नजर आती हैं जो झारखंड के दूरदराज इलाकों के कई गांव की पहचान बन गई है.

    क्या है मामला

    बहरहाल बात हो रही है गोड्डा के सीमावर्ती प्रखंड मेहरमा के  एक पंचायत शंकरपुर के आधा दर्जन गांवों की. ज्यादातर गांवों में आदिवासियों की ही संख्या अधिक है.  इन गांवों तक पहुंचने का कोई रास्ता तक नहीं है. जबकि यह पंचायत प्रखंड मुख्यालय से महज 3 किमी की दूरी पर स्थित है.  शंकरपुर पंचायत के करनटोला, झेलायटौला, चंपा समेत सात टोलो तक पहुचने के लिए कोई सड़क मार्ग नहीं है. गोड्डा पीरपैती मार्ग से उतर कर लोगों को 3 किमी की दूरी पैदल यात्रा करनी पड़ती है. गांव की ओर एक बांध गुजरा है. सुखाड़ के दिन में बांस पुल के सहारे इंसान हो या जानवर उसे गुजरने का एक मात्र जरिया है. गांवों की हालत बजबजाती नालियां, टूटी सड़क और जहां तहां फैली जिंदगी बयां करती है. प्रखंड के आला अधिकारी भी मानते हैं कि गांव की समस्या है. लेकिन अंचल निरीक्षक सनातन मरांडी कहते हैं कि समस्या सामने आयी है. बहरहाल, प्रखंड मुख्यालय से सटे पंचायत तक प्रशासन की नजर का नही पहुंच पाना चिराग तले अंधेरा की कहानी सुनाता है.

    (गोड्डा से रंजीत की खबर)

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