सियासत के संत थे पूर्व सांसद एके राय, फकीरी पसंद नेता ने सरकारी पेंशन तक नहीं लिया

समाजवादी विचारक राय दा का मानना था कि यदि सांसद कोई उत्पादन नहीं कर सकते, तो फिर वेतन, भत्ता और पेंशन लेने का उन्हें कोई हक नहीं है. सांसदों के वेतन- पेंशन को लेकर वे पहले शख्स थे, जिन्होंने लोकसभा में इसका विरोध किया था.

News18 Jharkhand
Updated: July 22, 2019, 1:24 PM IST
सियासत के संत थे पूर्व सांसद एके राय, फकीरी पसंद नेता ने सरकारी पेंशन तक नहीं लिया
मजदूरों के शोषण को देखकर एके राय ने इंजीनियरिंग की नौकरी छोड़ दी और मजदूरों के हक की लड़ाई लड़ने लगे.
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Updated: July 22, 2019, 1:24 PM IST
धनबाद के पूर्व सांसद और मार्क्सवादी नेता अरुण कुमार राय सियासत में सादगी की लंबी लकीर खींचकर इस दुनिया से चल बसे. रविवार को लंबी बीमारी के बाद धनबाद के सेंट्रल हॉस्पिटल में उनका निधन हो गया. इसी के साथ सियासी संत की उनकी छवि अमर हो गई. ईमानदारी की प्रतिमूर्ति, मजदूरों के मसीहा, गरीबों की आवाज, ना जानें और कितने अंलकार उनके साथ जीवनभर जुड़े रहे.

मजदूरों के लिए छोड़ दी अपनी नौकरी

15 जून 1935 को पूर्वी बंगाल, वर्तमान में बांग्लादेश में जन्मे एके राय ने कोलकाता विश्वविद्यालय से वर्ष 1959 में केमिकल इंजीनियरिंग में मास्टर की डिग्री ली. इसके बाद वे सिंदरी कारखाना में इंजीनियर के रूप में योगदान दिया. लेकिन यहां उन्हें मजदूरों का शोषण बर्दाश्त नहीं हुआ. कुछ ही दिनों में उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी और मजदूरों के हक के लिए लड़ाई लड़ने लगे.

सांसदों के वेतन-भत्ते का किया था विरोध 

समाजवादी विचारक राय दा का मानना था कि यदि सांसद कोई उत्पादन नहीं कर सकते, तो फिर वेतन, भत्ता और पेंशन लेने का उन्हें कोई हक नहीं है. सांसदों के वेतन- पेंशन को लेकर वे पहले शख्स थे, जिन्होंने लोकसभा में विरोध किया था.

अपने लिए कोई संपत्ति नहीं बनाई

मासस नेता एके राय वर्ष 1967,1969 और 1972 में धनबाद के सिंदरी से विधायक रहे. उसके वर्ष 1977, 1980 और 1989 में धनबाद से सांसद बने.
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अपने लंबे सियासी जीवन में एके राय ने अपने लिए कोई संपत्ति नहीं बनाई.


यहां तक सांसदी पेंशन लेने से भी इनकार कर दिया. मजदूरों के नेता रूप में उन्होंने हमेशा उनके हक के लिए संघर्ष किया.

झारखंड आंदोलन में रहे सक्रिय

मार्क्सवादी नेता एके राय झारखंड आंदोलन में भी सक्रिय रहे. गुरुजी शिबू सोरेन और बिनोद बिहारी महतो के साथ उन्होंने 1972 में झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) बनाया. बाद में उन्होंने मार्क्सवादी समन्वय समिति (मासस) नाम से अपनी पार्टी बनाई. वामपंथी विचारधारा के साथ राय दा जिंदगी भर गरीबों और मजदूरों के लिए सियासत करते रहे.

इनपुट- अभिषेक कुमार

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First published: July 22, 2019, 1:20 PM IST
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