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गया अधिवेशन के दौरान झरिया के कोयला उद्योगपति ने की थी बापू की आर्थिक मदद

धनबाद शहर

धनबाद शहर

आंदोलन के दौरान जब अधिवेशन के लिए बड़ी सहायता राशि की आवश्यकता हुई तो उन्होंने कोयलांचल का रुख किया. झरिया के कोयला उद्योगपति रामजस अग्रवाल उनकी इस कसौटी पर खरे उतरे. उन्होंने अपने किताब के जरिये बताया कि राजेंद्र प्रसाद और देश बंधु चितरंजन दास के कहने पर गांधीजी झरिया आए थे.

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धनबाद जिले के झरिया शहर से भी बापू की बहुत सी यादें जुड़ी हैं. यहां के कोयला उद्योगपतियों ने बापू के आह्वान पर स्वतंत्रता आंदोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था. प्रसिद्ध पत्रकार सह गांधीवादी लेखक वनखंडी मिश्र बताते हैं कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जब अधिवेशन के लिए बड़ी आर्थिक सहायता की जरूरत हुई तो उन्होंने कोयलांचल का रुख किया. इस दौरान झरिया के कोयला उद्योगपति रामजस अग्रवाल उनकी गांधी जी की मदद की थी.वनखंडी मिश्र ने अपने किताब के जरिए बताया कि राजेंद्र प्रसाद और देश बंधु चितरंजन दास के कहने पर गांधीजी झरिया आए थे.

वर्ष 1922 में गया कांग्रेस अधिवेशन की तैयारी चल रही थी. ऐसे में धन की जरूरत पड़ने पर रामजस अग्रवाल ने ब्लैंक चेक देकर बापू से राशि खुद भरने का आग्रह किया. इसी दौरान भीड़ में किसी ने कमेंट करते हुए यह कहा कि "चेक तो दे दियो भजेगो तब तो" इस पर रामजस अग्रवाल चेक फाड़ दी और सादे कागज पर रकम के साथ हस्ताक्षर कर हुंडी बापू को सौंप दी और कोलकाता से लेकर कानपुर तक किसी भी गद्दी में भजा लेने का आग्रह किया.

रामजस अग्रवाल की हवेली के अंदर सभा कक्ष में बापू जिस कुर्सी पर बैठा करते थे, वह आज भी पत्रकार बनखंडी मिश्र के पास सुरक्षित है.  इस कुर्सी को दक्षिण हिंदी प्रचार सभा, मद्रास ने पत्र भेजकर मांगा है. वर्ष 1918 में इस सभा की स्थापना गांधी जी ने की थी. यहां गांधी जी से जुड़ी चीजों को धरोहर के रूप में रखा जाता है.

गौरतलब है कि राष्ट्र पिता महात्मा गांधी धनबाद के झरिया में वर्ष 1921 से 1934 के बीच चार बार आए थे. गांधी के स्मारक और ऐतिहासिक धरोहरों पर शोध करने वाले युवा शोधार्थी प्रशांत मिश्र का कहना कि तत्कालीन बिहार से मिले कोयला व्यवसायी का योगदान राष्ट्रीय आंदोलन मे मिल का पत्थर साबित हुआ था.

गांधी जी की याद दिलाती रामजस अग्रवाल का  ऐतिहासिक महल भी अब वीरान हो चला है. हवेली की दीवारों पर दरारें पड़ने लगीं है. दीमकों ने लकड़ी की नक्कासियों पर अपना घर बना लिया है. रामजस अग्रवाल के पोते दिलीप अग्रवाल झरिया को छोड़कर अपने परिवार सहित धनबाद में रहते हैं. इस शहर में अब गांधी जी से जुड़ी कहानी और धरोहर सिर्फ किताब के पन्नों में तक सिमट कर रह गई है.

यह भी पढ़ें- 150वीं जयंती पर राज्यपाल और CM रघुवर दास ने बापू को किया नमन

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