दावा: लाल चावल खाने वाले झारखंड के इस गांव में किसी को नहीं हुआ कोरोना, जानें- क्यों है लाभकारी?

लाल चावल के लिए धान को साफ कर तैयार करती महिला.

लाल चावल के लिए धान को साफ कर तैयार करती महिला.

झारखंड (Jharkhand) के पूर्वी सिंहभूम के घाटशिला अनुमंडल का एक ऐसा गांव है जहां पर अबतक कोई भी कोरोना पॉजिटिव (Corona Positive) नही हुआ है.

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घाटशिला. झारखंड (Jharkhand) के पूर्वी सिंहभूम के घाटशिला अनुमंडल का एक ऐसा गांव है जहां पर अबतक कोई भी कोरोना पॉजिटिव (Corona Positive) नही हुआ है. ऐसा गांव के लोग इसलिये मानते हैं, क्योंकि वे ढेकी कुटा लाल चावल खाते हैं. ग्रामीणों का मानना है कि लाल चावल खाने से इम्युनिटी बढ़ती है और वे इसलिये स्वस्थ्य रहते हैं. घाटशिला अनुमंडल के डुमरिया प्रखंड का सुदूर और पहाड़ी गांव बाकुलचंदा में हर किसी घर में आपको चावल कुटने वाली पुराने जमाने की मशीन ढेकी मिल जायेगी. आज भी इस गांव के लोग ढेकी से चावल कुटने के बाद - लाल चावल खाते हैं. इन दिनो गर्मी में लाल चावल और उसके माड़ - माड़ भात खा कर स्वस्थ्य रहते हैं.

गांव के ग्रामीण बताते है कि वे चावल की खेती में भी गोबर से बनी खाद का उपयोग करते हैं. लाल चावल खाने से इम्यूनिटी बढ़ती है , जिससे वे बहुत कम बीमार पड़ते हैं. जहां चारों तरफ कोरोना के पॉजिटिव मिल रहे हैं, वहीं इस गांव में अबतक एक भी कोरोना पॉजिटिव नहीं है. बाकुल चंदा गांव के बारे में भी कहा जाता है कि इस गांव में ढेकी के चावल काफी मसहूर है. गांव के लोग ढेकी से ही चावल और चुड़ा कुटते और उसे बेचते भी हैं.  बाकुल चंदा गांव के आस पास के लोग भी इसी गांव से लाल चावल भी खरीद कर ले जाते हैं. आज के जमाने में चावल कुटने वाली ढेकी अब शायद ही कहीं देखने को मिलती है, लेकिन इस गांव हर किसी के पास ढेकी कुटने वाली मशीन है.

इस तरह तैयार होता है लाल चावल

समय बदला , जमाना बदला और ढेकी के चावल हर जगह नहीं मिलते हैं. लोग अब फैक्ट्री से बनी चावल खाते हैं.  लाल चावल के बारे में भी कम लोगों को पता है. धीरे धीरे अब ढेकी के चावल भी लुप्त होने लगे हैं. सरकार द्वारा राशन में मिलने वाली चावल से भी कई लोगों ने अपने अपने ढेकी से चावल बनाने बंद कर दिये हैं. अब सुदूर और ग्रामीण इलाके में किसी किसी गांव में ढेकी कुटने वाली चावल की मशीन जो लकड़ी से बनायी जाती है वह देखने को मिल सकती है. ढेकी कुटने वाली चावल की मशीन --ढेकी कुटने वाली चावल की मशीन लकड़ी से बनी होती है. चावल कुटने के लिये इसमें दो लोगों की जरूरत होती है. बारी बारी वो अपने पैर से लकड़ी को चलाते हैं. जिससे जमीन पर बने गड्डे में धान डाला जाता है. इसी गड़्ड़े में ढेकी के मशीन को पटक पटक कर चावल बनाये जाते है.
इस तरह तैयार होता है लाल चावल

लाल चावल के बारे में ग्रामीण संध्यारानी सरदार, भक्ती नायक बताती हैं कि पहले धान को सुखाया जाता है , फिर इसे गर्म पानी में उबाल कर फिर से सुखाने के बाद इसके चावल बनाते हैं. ढेकी में चावल बनाने पर चावल के पोष्टिक बेकार नहीं जाते है और इसके खाने के बाद आधुनिक मशीन से बनी चावल से कई गुणा पोष्टिक रहते है. बाकुलचंदा गांव में दूर दराज से भी लोग लाल चावल खरीदने के लिये आते हैं.
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