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2000 एकड़ जमीन को लेकर झारखंड-ओडिशा में विवाद, 56 साल में 8 प्रयासों के बावजूद नहीं निकला हल

विवादित जमीन का जायजा लेतीं बीडीओ सीमा कुमारी
विवादित जमीन का जायजा लेतीं बीडीओ सीमा कुमारी

ग्रामीणों के मुताबिक पहले ये जमीन झारखंड की थी, लेकिन अब ओडिशा ने इसे अपने कब्जे में ले रखा है.

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झारखंड और ओडिशा के बीच भूमि विवाद को देखते हुए पूर्वी सिंहभूम के गुड़ाबांदा की बीडीओ सीमा कुमारी ने विवादित इलाके का जायजा लिया. बहरागोड़ा और गुडाबांधा के ग्रामीणों के मुताबिक पहले ये जमीन झारखंड की थी, लेकिन अब ओडिशा ने इसे अपने कब्जे में ले रखा है.

झारखंड और ओडिशा के सीमावर्ती इलाके में वर्षो से जमीन विवाद जारी है. साल 1985 में ओडिशा ने सर्वे स्टेलमेन्ट कराकर झारखंड की करीब 2000 एकड़ जमीन को अपना बताते हुए कब्जे में लिया. जबकि झारखंड के द्वारा साल 1964 के बाद से अबतक कोई सर्वे स्टेलमेन्ट नहीं कराया गया है. अब ओडिशा सीमावर्ती इलाके के कई एकड़ बेचिरागी जमीन को भी अपना बता रहा है.

दरअसल सुवर्णरेखा नदी के कटाव और दिशा बदलने के कारण पूर्वी सिंहभूम के पांच गांव पर ओडिशा और वहां के लोगों ने कब्जा जमा लिया. बहरागोड़ा अंचल के सोना पेटपाल, छेड़घाटी, काशीपाल, कुड़िया, मोहनपाल, पुरसान और गुडबांधा के कैमा गांव  इनमें शामिल हैं. इलाके के ग्रामीणों का दावा है कि झारखंड की करीब 2000 एकड़ जमीन ओडिशा के कब्जे में है. ग्रामीणों के मुताबिक पहले उन जमीनों पर झारखंड के लोग खेती करते थे. लेकिन नदी के कटाव होने के कारण वहां के लोग महुलडांगरी व अन्य इलाके में आकर बस गये. अब वहां ओडिशा के लोगों ने कब्जा जमा लिया है.



बीडीओ सीमा कुमारी ने कहा कि ओडिशा और तत्कालीन बिहार (अब झारखंड) की सीमा गुडाबांधा कैमा गांव के कड़ियानाला को माना गया था. लेकिन बाढ़ से कटाव और नाले-नदी का स्वरूप समय के साथ बदलता चला गया. इसमें बहरागोड़ा-गुड़ाबांदा प्रखंड के सीमावर्ती गांवों में रहने वाले रैयतों का कोई कसूर नहीं है. इनकी पुश्तैनी जमीन पर इन्हें कब्जा मिलना चाहिए.
इस विवाद को सुलझाने के लिए झारखंड और ओडिशा के द्वारा कई बार प्रयास किये गये, लेकिन अबतक समाधान नहीं निकल पाया.

पहला प्रयास- 9 सितंबर 1962-  जमशेदपुर परिसदन में दोनो राज्यों के पदाधिकारियों की बैठक, 16 सितंबर को संयुक्त स्थल का निरीक्षण किया गया. 1963 से 1965 तक संयुक्त बैठकें चलती रहीं

दूसरा प्रयास- 1972 में तत्कालीन बंदोबस्त पदाधिकारी महिन्द्र सिंह ने चारों गांव का स्थल निरीक्षण किया और विवादित जमीन को बिहार राज्य का माना

तीसरा प्रयास - 6 जनवरी 1976 को गृह मंत्रालय के परामर्शी केवी के सुंदरम ने दोनों राज्यों के पदाधिकारियों के साथ बैठक की. उस दौरान 50-60 सालों से उस मौजा में बिहार का राजस्व प्रशासन होने के कारण बिहार के दावे को मान लेने का मंतव्य दिया था.

चौथा प्रयास- 10 दिसंबर 1983 को सिंहभूम व मयूरभंज के डीसी ने स्थल का दौरा किया और सिंहभूम के उपायुक्त के आदेश पर सीमा स्थल खूंटागाड़ी की गयी.

पांचवां प्रयास- 19 अगस्त 1992 को दोनों राज्यों के पदाधिकारियों की जमशेदपुर में बैठक हुई

छठा प्रयास- 13 जुलाई 2005 को झारखंड और ओडिशा के पदाधिकारियों की भुवनेश्वर में बैठक हुई . संयुक्त स्थल निरीक्षण का लिया गया निर्णय

सातवां प्रयास- 3 और 4 अप्रैल 2008 को संयुक्त स्थल का निरीक्षण किया गया

आठवां और अंतिम प्रयास - अंतिम बार जून 2016 में बैठक हुई. प्रशासन की ओर से सर्वे रिपोर्ट दी गयी. इसके बाद से कोई प्रयास नहीं किया गया.

बहरहाल झारखंड और ओडिशा राज्य के बीच जमीन के जिस बड़े भू-भाग पर जिच कायम है, वह बेचिरागी ग्राम के तौर पर नक्शा- खतियान में दर्ज है.

(प्रभंजन कुमार की रिपोर्ट)

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