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आज भी गुफा में रहते हैं ये परिवार, आदि मानव की तरह जी रहे जिंदगी!
East-Singhbum News in Hindi

Prabhanjan kumar | News18 Jharkhand
Updated: May 22, 2020, 8:36 PM IST
आज भी गुफा में रहते हैं ये परिवार, आदि मानव की तरह जी रहे जिंदगी!
पहाड़ी नाले का पानी पीना, पत्थर की गुफा में रहना, भूख लगने पर जंगल के फल या कलमूद खाना और जैसे-तैसे रहना इनकी जीवन शैली है.

पत्थर की गुफा में दोनों सबर परिवार खाना बनाते हैं और रात को सोते हैं. दिन भर तो जंगल में बीत जाता है, लेकिन रात होने पर गुफा में आना पड़ता है. रात के समय रौशनी के लिए आग जलाकर रखते हैं.

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पूर्वी सिंहभूम. झारखंड और ओडिशा बॉर्डर पर लखाईडीह पहाड़ पर एक ऐसी तस्वीर देखने को मिलती है जिसे देख कर विश्वास नहीं होता कि आज भी ऐसे परिवार हैं जो पत्थर की गुफा में रहते हैं. चारों तरफ जंगल और पहाड़ के बीच चट्टानों की गुफा में दो सबर परिवार रहते हैं. एक लखाईडीह गांव का है और दूसरा दस साल पहले ओडिशा से झारखंड आया था लेकिन कोई सुविधा नहीं मिलने पर यह भी चट्टानों की गुफा को घर बना लिया और अपनी पत्नी, बच्चे और मां के साथ गुफा में रहने लगा.

आदि मानव की तरह जी रहे जिंदगी
इनके रहने का तरीका को देख कर हम कह सकते हैं कि आदि मानव की जिंदगी जी रहे हैं. पहाड़ी नाले का पानी पीना, पत्थर की गुफा में रहना, भूख लगने पर जंगल के फल या कलमूद खाना और जैसे-तैसे रहना इनकी जीवन शैली है. शरीर पर कपड़े हैं या नहीं इसकी कोई चिंता नहीं बस जंगल में जहां इच्छा हुई बैठ गए या आराम कर लिए. पत्थर की गुफा में दोनों सबर परिवार खाना बनाते हैं और रात को सोते हैं. दिन भर तो जंगल में बीत जाता है, लेकिन रात होने पर गुफा में आना पड़ता है. रात के समय रौशनी के लिए आग जलाकर रखते हैं.

10 सालों से गुफा में रहने वाले सबर परिवार कौन



गुफा में रहने वाले दो सबर परिवार है, जिसमें एक का नाम सुरू सबर और दूसरा का नाम कोचाबुधू सबर है. सुरू सबर अपनी पत्नी सुकमति सबर के साथ रहते हैं और दूसरा कोचाबुधू सबर अपनी पत्नी सुनमणी सबर, बेटे शंभू सबर, मंगडू सबर, बेटी चंपा सबर और मां सनीबारी सबर के साथ रहते हैं. दोनों परिवार मिलाकर कुल 8 से 10 लोग गुफा में रहते हैं. दस सालों से यहां रहते अब इन सबर परिवारों का जीवन मानो जंगल और पहाड़ी गुफा में आम सा हो गया है. सबर के बच्चे भी चट्टानों पर ऐसे खेलते है जैसे मानो बचपन से अभ्यास हो. जिस चट्टानों के गुफा में रहते हैं, उसी चट्टानों के ऊपर सबर के बच्चों खेलते भी हैं. जब खेलने की इच्छा हुई तो वे चट्टानों पर बंदरों की तरह चढ़ जाते और उतर भी जाते हैं. बच्चों को छोटे से ही पत्थरों पर चढ़ाना भी सिखाया जाता है ताकि अपनी रक्षा भी कर सके.



पत्थरों की गुफा में आप देखेंगे तो लगेगा जैसे आप अपने घरों को सजाते है. पत्थरों का अलमीरा बनाकर समान रखे गए हैं. दूर-दूर तक जंगल और पहाड़ी होने के कारण हाथियों और जंगली जानवारों का भी भय बना रहता है, जिससे सबर परिवार ने पेड़ पर भी मचान बना रखा है. कभी भी खतरा हुआ तो सभी मचान पर चढ़ जाता है. सबर परिवार जंगल में थोड़ी खेती करते हैं. मचान से हाथियों को भगाने का काम भी करते हैं.

प्रशासन को नहीं है जानकारी
डुमरिया प्रखंड के बीडीओ मुरली यादव ने कहा कि लखाईडीह पहाड़ के चट्टानों पर सबर परिवारों के रहने की कोई जानकारी नहीं है. अगर ऐसी बात है तो वे इस पर पहल करेंगे. उन्होंने कहा कि लकाईडीह गांव ओडिशा और झारखंड सीमा पर है. पहाड़ के चट्टानों के गुफा में बसा सबर परिवार झारखंड में है या ओडिशा  में इसका सीमा के बारे में कोई जानकारी भी नहीं है.

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First published: May 22, 2020, 8:23 PM IST
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