Jharkhand : बेहद बीमार अस्पताल! क्वारंटाइन सेंटर में मरीज़ नहीं, कैंपस में घूमते हैं जानवर

घाटशिला के बहरागोड़ा में अस्पताल का जर्जर भवन.

घाटशिला के बहरागोड़ा में अस्पताल का जर्जर भवन.

पूर्वी सिंहभूम के प्रखंड की आबादी के लिए कहने को चार से पांच अस्पताल हैं, लेकिन डॉक्टर एक चौथाई भी नहीं हैं. स्टाफ, एंबुलेंस से जुड़ी कई समस्याओं के बारे में चिकित्सा प्रभारी ने दावों की पोल खोल दी है.

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घाटशिला. पूर्वी सिंहभूम के अस्पताल की बदहाली को इस तरह समझिए : यहां पहुंचना ही टेढ़ी खीर है क्योंकि रास्ता ही नहीं है, जितने होने चाहिए बमुश्किल उसके चौथाई डॉक्टर हैं, अन्य स्टाफ न के बराबर है, जर्जर भवन, बिजली और पानी की परेशानी है, और तो और इस अस्पताल में जानवर घूमते नज़र आते हैं... यह तस्वीर है पूर्वी सिंहभूम के घाटशिला अनुमंडल के बहरागोडा प्रखंड के सरकारी अस्पताल की, जहां समस्याएं बयान की जाएं तो लगता है कि यहां कि सब कुछ भगवान भरोसे ही चल रहा है.

कोरोना काल में जहां लोगों को स्वास्थ्य सुविधा बेहतर मिलना चाहिए, वहां राम भरोसे चल रहे इस अस्पताल में महज़ खानापूरी ही नज़र आ रही है. अस्पताल के प्रभारी चिकित्सक ओपी चौधरी ने भी माना कि यह अस्पताल समस्याओं से बुरी तरह संक्रमित है. चौधरी ने कई बार आला अफसरों को हाल बताया लेकिन जल्द निदान के आश्वासन के बाद भी कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया.

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बदहाली पर आंसू बहा रहा सामुदायिक अस्पताल

बहरागोडा का यह सीएचसी सरकारी व्यवस्था और दावों की हकीकत बयान करने की मिसाल बन चुका है. प्रभारी चिकित्सक ने माना कि अव्वल तो अस्पताल तक पहुंचने के लिए सड़क ही नहीं है. बारिश होने पर मरीज़ों को कीचड़ में चलकर अस्पताल आना पड़ता है. हद तो यह है कि कोई चारदीवारी नहीं है, जिससे अस्पताल परिसर में पशु घूमते रहते हैं.

मेडिकल स्टाफ और सुविधाओं का ब्योरा



बहरागोडा में चार अस्पताल हैं, एक ट्रॉमा सेन्टर है. सभी को मिलाकर कम से कम 20 डॉक्टर होना चाहिए लेकिन हैं केवल पांच ही. फ़िलहाल इनमें से भी दो पॉज़िटिव हैं यानी तीन डॉक्टरों के भरोसे 24 घंटे अस्पताल चल रहे हैं. स्वास्थ्यकर्मियों, पैरा मेडिकल स्टाफ की कमी का आलम यह है कि एक भी ड्रेसर नहीं है, ए ग्रेड नर्स नहीं है...

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एंबुलेंस सुविधा का आलम यह है कि मरीज़ ठेले पर अस्पताल लाए जाते हैं.

आपको याद दिलाएं कि दो दिन पहले ही एक ठेले पर मरीज़ को अस्पताल लाया गया और इलाज के बाद उसे ठेले पर ही घर जाना पड़ा, क्यों? क्योंकि यहां बड़ी आबादी के बीच सिर्फ एक एंबुलेंस है. इस एक एंबुलेंस के भरोसे चार अस्पताल और एक ट्रॉमा सेंटर का संचालन हो रहा है.

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अब जानिए क्वारंटाइन सेंटर का हाल

बहरागोडा में बनाये गये क्वारंटाइन सेंटर की तस्वीर भी आपको सर पीटने पर मजबूर कर सकती है. ट्रॉमा सेंटर में क्वारंटाइन सुविधा देखकर ही समझ आ जाता है कि यह सिर्फ कागज़ी प्रोजेक्ट है या खानापूरी. कोरोना की दूसरी लहर के संकट से सभी वाकिफ हैं, इसके बावजूद इस सेंटर में एक भी मरीज़ नहीं है, क्यों? दस बेड का यह सेंटर पानी के अभाव में चालू ही नहीं हो सका, जिसके कारण अस्पताल परिसर में अलग से एक क्वारंटाइन व्यवस्था करना पड़ी.

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अस्पताल में बनाए गए क्वारंटाइन सेंटर के नाम पर हॉल में सिर्फ एक बेड है.

इस व्यवस्था का आलम यह कि जर्जर भवन के दो हॉल में एक एक बेड लगाया गया. यों तो ऑक्सीजन युक्त पांच बेड की व्यवस्था बतायी गई है, लेकिन दो कमरों में ऐसे दो ही बेड हैं. गौर करने की बात तो यही है कि दावे कुछ भी हों, किसी भी क्वारंटाइन सेंटर में कोई प्रवासी या संक्रमित भर्ती नहीं है. सभी अपने घरों में ही क्वारंटाइन हैं.

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