तालाब सूखा, कुआं भी प्यासा, पानी की किल्लत ऐसी कि गांव में शादी होती न श्राद्ध!

गांव की लाइफलाइन तालाब सूख चुका है.

गांव की लाइफलाइन तालाब सूख चुका है.

पहाड़ी गांव के जीवन की अपनी मुश्किलें हैं. पीने के पानी की समस्या यहां सालों से बरकरार है. ग्रामीण इस समस्या के चलते कोई सामाजिक कार्यक्रम न कर पाने वाले ग्रामीणों के सामने अब पलायन का संकट भी मुंह बाए खड़ा है.

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घाटशिला. पूर्वी सिंहभूम के घाटशिला अनुमंडल के मुसाबनी प्रखंड के सुदूर पहाड़ी गांव कालाझरी में पानी के लिए लोगों को हर दिन जद्दोजहद करनी पड़ती है. गांव का इकलौता तालाब भी सूख गया है. पानी के लिए एक सिंचाई कुआं है, जिससे करीब एक किलोमीटर लंबे पाइप और टुलू पंप से लोग पानी गांव तक लाने की जुगत कर रहे हैं. लेकिन यह जुगत भी आसान नहीं है और हालात इतने खराब हैं कि पानी न होने के कारण पलायन तक की नौबत सामने दिख रही है.

वास्तव में, सिंचाई कुआं गांव से दूर खेत में है. यानी गांव तक इसका पानी लाने के लिए तीन टुलू पंप लगाने पड़े हैं. तब जाके बूंद बूंद पानी पाइप से गांव पहुंच पा रहा है. ग्रामीणों ने अंदेशा जताते हुए कहा कि यह कुआं भी आने वाले समय में सूख जाएगा और ऐसे में पानी के लिए उन्हें दूसरे गांवों की ओर रुख करना पड़ेगा. गांव में एक भी चापाकल नहीं है, जिससे पानी की समस्या सालों से बरकरार है.

नहीं हो पाते कोई उत्सव!

पानी की किल्लत का आलम इस तरह का है कि गांव में किसी तरह का कोई उत्सव नहीं होता. यहां 11 साल बाद गांव के रहने वाले बहादुर बानरा ने पानी के टैंकर की व्यवस्था कर श्राद्ध कार्यक्रम संपन्न करवाया था. पानी टैंकर की व्यवस्था झामुमो के केन्द्रीय सदस्य कान्हू समांत के माध्यम से की गयी थी, जिससे 11 साल के बाद गांव में कोई सामाजिक कार्यक्रम हो सका.
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तीन टुल्लु पंप लगाकर किसी तरह ग्रामीण पानी की जुगत कर रहे हैं.


गांव में पानी की समस्या पर समांत ने कहा कि घाटशिला के विधायक रामदास सोरेन को समस्या के बारे में बताकर जल्द ही गांव में चापाकल, सोलर जलमीनार की व्यवस्था करवाई जाएगी. 11 साल बाद गांव में श्राद्ध कार्यक्रम के बारे में उन्होंने बताया कि आदिवासी समाज में मकर पर्व के बाद और हो समाज में माघे पर्व के बाद ही शादी या श्राद्ध का कार्यक्रम होता है. पानी की किल्लत से गांव में किसी तरह का कोई शादी या श्राद्ध नहीं हो पाया था.

मई तक प्यासा रहता है तालाब



15 घरों वाले कालाझरी गांव टोला में एक भी चापाकल नहीं है. इस गांव के साथ ही आसपास के कुछ और गांव भी उस तालाब पर निर्भर करते हैं, जो जनवरी से मई के महीने तक सूखा पड़ा रहता है. मई के बाद बारिश के चलते इसमें कुछ पानी ज़रूर आ जाता है. करीब 20 फीट की गहराई वाले इस तालाब से से बाकी के महीनों में जैसे तैसे पानी की आपूर्ति हो पाती है, लेकिन करीब आधा साल यहां बूंद भर भी मुहाल होता है.

वहीं, खेत में बने सिंचाई कुएं से ही ग्रामीण पानी लेकर आते हैं. बताया जाता है कि सालों पहले एक चापाकल यहां था, लेकिन विभाग ने उसे मृत घोषित कर दिया. अब यहां पानी का एकमात्र स्रोत तालाब ही है, जो सूख चुका है. जनवरी से लेकर मई तक पानी के लिए कालाझरी गांव के लोग बूंद बूंद पानी को तरसते हैं.
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