घाटशिला के ग्रामीण इलाकों में धूमधाम के साथ मनाया गया सोहराय पर्व

पूर्वी सिंहभूम के घाटशिला जैसे ग्रामीण इलाके में धूमधाम के साथ सोहराय पर्व मनाया गया. पांच दिनों तक चलने वाले इस सोहराय पर्व में लोग अपने घरों की साज-सजावट, घरों के गाय और बैलों की पूजा करते हैं. धान की अच्छी फसल के बाद इस पर्व को पूरे धूमधाम के साथ मनाया जाता है.

Prabhanjan kumar | News18 Jharkhand
Updated: November 10, 2018, 5:00 PM IST
घाटशिला के ग्रामीण इलाकों में धूमधाम के साथ मनाया गया सोहराय पर्व
परंपरागत ढंग से धूमधाम के साथ सोहराय पर्व मनाते आदिवासी
Prabhanjan kumar | News18 Jharkhand
Updated: November 10, 2018, 5:00 PM IST
पूर्वी सिंहभूम के घाटशिला जैसे  ग्रामीण इलाके में धूमधाम के साथ सोहराय पर्व मनाया गया. पांच दिनों तक चलने वाले इस सोहराय पर्व में लोग अपने घरों की साज-सजावट, घरों के गाय और बैलों की पूजा करते हैं. धान की अच्छी फसल के बाद इस पर्व को पूरे धूमधाम के साथ मनाया जाता है.

सोहराय पर्व को मनाने के लिए एक दूसरे के घर एक सप्ताह से पूर्व से ही रिश्तेदारों के जुटान होने लगता है. बैल नृत्य इस पर्व का आकर्षण का केन्द्र रहता है. लोग एक दूसरे से मिलते है और मांदर की थाप पर बैलों और गाय के साथ नृत्य करते हैं. अगले साल अच्छी फसल होने की कामना भी लोग भगवान से करते हैं.

भारत देश कृषि प्रधान देश है और आज भी ग्रामीण इलाके में किसान खेती के लिए अपनी मवेशियों पर ही निर्भर रहते हैं. डिजिटल इंडिया में गांव के आदिवासी किसान कम से कम अपनी परंपरा को जीवित रखने का काम कर रहे हैं. किसान बैलों को खुश करने के लिए सोहराय पर्व धूमधाम के साथ मनाते हैं.

सोहराय पर्व मनाने का मुख्य उद्देश्य गाय और बैलों को खुश करना है. गाय और बैल बेजुबान होते हैं और उनकी मेहनत से ही खेतों में फसल तैयार होती है. उनके साथ खुशियों को बांटने के लिए यह पर्व मनाया जाता है. इसके अलावा हर वर्ष फसल अच्छा हो, इसको लेकर प्रार्थना की जाती है.

पांच दिनों तक चलने वाले इस सोहराय पर्व के पहले दिन गोट बोंगा के अवसर पर ग्रामीण अपने अपने गाय और बैलों को एकजुट कर इकट्ठा करते है.शाम में उनके आगमन से पूर्व घर के प्रवेश द्वार की साफ-सफाई कर सजाकर किया जाता है. दूसरे दिन गोड़ा बोंगा मनाया जाएगा.

तीसरे दिन खुन्टो बोंगा मनाया जाएगा. इस दौरान गांव के लोग अपने गाय और बैलों के साथ नृत्य कर खुशियों को बांटते हैं. चौथे दिन गांव की महिलाओं व पुरुषों द्वारा एक टोली बनाकर एक-दूसरे के घर बांसुरी बजाकर जाते हैं. अंतिम दिन लोगों द्वारा अपने खेत की नई फसल निकालकर खिचड़ी बनाई जाती है और पूरे गांव के लोग नई फसल की खिचड़ी खाते हैं.

यह भी पढ़ें - CM रघुवर दास और रतन टाटा ने किया कैंसर अस्पताल का शिलान्यास, अत्याधुनिक सुविधाओं से होगा लैस
Loading...
यह भी पढ़ें - यह भी पढ़ें - इसरायल से प्रशिक्षण लेकर लौटे किसान, कहा आधुनिक तकनीक से कृषि क्षेत्र में होगा विकास
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर