Exclusive: सारंडा के घने जंगल के बीच 72 km पैदल चलकर 400 लोगों की जिंदगी बचा रही CRPF
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Exclusive: सारंडा के घने जंगल के बीच 72 km पैदल चलकर 400 लोगों की जिंदगी बचा रही CRPF
सारंडा इलाके में रहने वाले ग्रामीणों को राशन और मास्‍क उपलब्‍ध कराते हुए सीआरपीएफ के सीनियर कमांडेंट परमा शिवम.

Lockdown के बीच झारखंड के सारंडा जंगलों में रहने वाले 400 लोगों तक राशन पहुंचाने के लिए सीआरपीएफ (CRPF) के जवानों को बारूदी सुरंग और नक्‍सलियों (Naxalites) के एंबुश का खतरा भी मोल लेना पड़ता है.

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झारखंड (Jharkhand) के सारंडा इलाके में लोगों को कोरोना वायरस (Coronavirus) के संक्रमण से ज्‍यादा खतरा भूख से है. चूंकि इलाका घने जंगलों वाला है और नक्‍सलियों की दहशत अभी भी लोगों के जहन में है, लिहाजा, भुखमरी के कगार पर खड़े इन लोगों को राहत पहुंचाने का काम केंद्रीय रिजर्व पुलिसबल ने अपने हाथों में लिया है. प्रशासन या किसी गैरसरकारी संस्था के सारंडा न पहुंचने के बाद सीआरपीएफ (CRPF) ने यहां रहने वाले परिवारों तक मदद पहुंचाना शुरू किया है. आपको जानकर ताज्‍जुब होगा कि इस इलाके में रहने वाले 400 लोगों तक राशन पहुंचाने के लिए सीआरपीएफ की टीम को करीब 72 किमी पैदल चलना पड़ता है. सारंडा में शुरू किए गए राहत अभियान के बारे में विस्‍तार से जानने के‍ लिए न्‍यूज 18 हिंदी डिजिटल की टीम ने सीआरपीएफ के वरिष्‍ठ कमांडेंट परमा शिवम से बातचीत की. प्रस्‍तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश:-

सबसे पहले आप सारंडा इलाके के बारे में बताइए. यह इलाका कहां है, कितना दुर्गम है और यहां राहत पहुंचाना कितना मुश्किल है?
सारंडा झारखंड का नक्‍सलवाद से ग्रस्‍त पिछड़ा हुआ इलाका है. यह इलाका पश्चिमी सिंहभूम जिले के मुख्‍यालय चाईबासा से करीब 135 किमी दूरी पर स्थित है. सारंडा एशिया में शाल नामक वृक्ष का सबसे बड़ा जंगल भी है. करीब 800 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ यह इलाका कभी नक्‍सल गतिविधियों का गढ़ रहा है. 2012 में सीआरपीएफ ने इस इलाके में नक्‍सलवाद के खिलाफ अभियान चलाया था. फिलहाल यहां पर नक्‍सलियों की नाममात्र की गतिवधियां बची हुई हैं. आज भी यह इलाका देश के सबसे अभावग्रस्‍त इलाकों में से एक है. यहां पर बहुत से इलाके ऐसे भी हैं, जहां पर आज भी सड़क और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं. आज भी इस इलाके से मुख्‍य सड़क की जो दूरी है, वह करीब 32 किमी है. यानी इस इलाके में जाने के लिए सीआरपीएफ को करीब 32 किमी पैदल चलना पड़ता है.

सारंडा के इलाके में कोरोना वायरस के संक्रमण का कितना प्रभाव है. इस इलाके को कोरोना संक्रमण से बचाने के लिए लॉकडाउन और सोशल डिस्‍टेंसिंग जैसे उपाय किए जा रहे हैं?
अभी तक सारंडा में कोरोना वायरस के संक्रमण का कोई भी मामला सामने नहीं आया है. यहां लोगों को कोरोना वायरस के संक्रमण से ज्‍यादा खतरा भुखमरी से है. सारंडा इलाके में जितने भी लोग रहते हैं, वह भयंकर रूप से अभावग्रस्‍त और पिछड़े हैं. यहां पर गरीबी है और लोगों के पास जीविका का कोई साधन भी नहीं है. जहां तक लॉकडाउन का सवाल है, चाईबासा और सारंडा के लिए लॉकडाउन के मायने बिल्‍कुल अलग हैं. चाईबासा जो कि जिला मुख्‍यालय है, वहां लॉकडाउन के बाद जरूरत की चीजें मुहैया कराने के लिए न केवल सरकारी एजेंसियां हैं, बल्कि बहुत सारे एनजीओ भी सक्रिय हैं. लेकिन सारंडा की हालत ऐसी नहीं है. यहां लॉकडाउन के नाम पर साप्‍ताहिक बाजार बंद कर दिया गया है, जिससे लोगों की जरूरतों का ख्‍याल करने वाला भी कोई भी नहीं है.



सीआरपीएफ ने करीब 400 परिवारों को राशन उपलब्‍ध कराया है. CRPF provided ration to about 400 families.
सीआरपीएफ ने करीब 400 परिवारों को राशन उपलब्‍ध कराया है.


जब सरकारी एजेंसियों और एनजीओ की निगाह से यह इलाका बचा हुआ है, ऐसे में आपका ध्‍यान इस इलाके पर कैसे आया. आपने अपनी मुहिम के लिए सारंडा को कैसे और क्‍यों चुना?
नक्‍सलवादियों के गढ़ के रूप में कुख्‍यात इस इलाके सीआरपीएफ ने 2012 में अपना ऑपरेशन शुरू किया था. नक्‍सलियों के सफाए के साथ सीआरपीएफ ने जंगल के काफी भीतर जाकर करमपदा, जमाईगो और थलकोबाद में अपनी पोस्‍ट बनाई. थलकोबाद एक जमाने में नक्‍सलियों का सबसे बड़ा गढ़ कहा जाता था. बीते आठ वर्षों में विभिन्‍न ऑपरेशन के जरिए हम उन इलाकों तक पहुंचने में कामयाब हुए हैं, जहां पर अभी तक कोई नहीं पहुंच पाया था. ऑपरेशन के दौरान, हमने नक्‍सलियों का ही सफाया नहीं किया है, बल्कि यहां रहने वाले ग्रामीणों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति का गहन अध्‍ययन भी किया है. लॉकडाउन के बाद हमें अंदाजा था कि घने जंगल के भीतर बसे गांवों में स्थितियां ठीक नहीं होंगी. पहले हमने गांव का सर्वे कराया. इसके बाद सारंडा में राहत कार्य शुरू किया गया.

सीआरपीएफ इस इलाके में कितने लोगों को राशन मुहैया करा रही है. आपने बताया कि इस इलाके से मुख्‍य सड़क की दूरी करीब 32 किमी है. ऐसे में आप राशन के साथ इतना लंबा रास्‍ता पैदल कैसे तय करते हैं?
सारंडा के इलाके में करीब 400 लोग ऐसे हैं, जिनको सीआरपीएफ राशन उपलब्‍ध करा रही है. राशन के तौर पर उन्‍हें 5 किलो चावल, एक किलो दाल, एक किलो आलू, आधा किलो सोया बरी, आधा लीटर तेल, बिस्‍कुट, नमक का पैकेट दिए जा रहे हैं. इसके अलावा हर पैकेट में 5-5 मास्‍क भी दिए जा रहे हैं. राशन वितरण के समय गांव के लोगों को कोरोना वायरस के संक्रमण, उसके खतरे और बचाव के बारे में भी बताया जा रहा है. उन्‍हें मास्‍क पहनने के निर्देश दिए गए हैं. अब जहां तक राशन पहुंचाने का सवाल है तो हम इसके लिए बाइक और छोटी गाड़ियों का इस्‍तेमाल करते हैं. जबकि जवान तकरीबन 72 किमी का सफर पैदल ही तय करते हैं. जवानों को गांव वालों तक राशन पहुंचाने में कठिन श्रम करना पड़ता है. लेकिन जब खाने का सामान मिले के बाद हमें दुआएं देते हैं, तब यह श्रम बिल्‍कुल हल्‍का लगने लगाता है.

सारंडा इलाके में रहने वाले ग्रामीणों को राशन और मास्‍क उपलब्‍ध कराते हुए सीआरपीएफ के सीनियर कमांडेंट परमा शिवम. Perma Shivam, Senior Commandant of CRPF providing ration and masks to the villagers living in Saranda area.
सारंडा इलाके में रहने वाले ग्रामीणों को राशन और मास्‍क उपलब्‍ध कराने जाते सीआरपीएफ के सीनियर कमांडेंट परमा शिवम.


सारंडा में भले ही नक्‍सल गतिविधियां कम हो गई हों, लेकिन खत्‍म नहीं हुई हैं. ऐसे में यह अभियान आपके लिए कितना जोखिम भरा है?
फिलहाल, हम सप्‍ताह में दो बार उनके पास जा रहे हैं. एक बार में हम उनके पास इतना सामान छोड़ आते हैं, जिससे वह आठ-दस दिन आसाम से खा सकें. चूंकि हमें घने जंगल के बीच पैदल रास्‍ता तय करना है तो बारूदी सुरंग और एंबुस का खतरा लगातार बना रहता है. पहले नक्‍सली गाड़ियों को उड़ाने के लिए बारूदी सुरंगों का इस्‍तेमाल करते थे, लेकिन अब वह बाइक और पैदल पार्टी को नुकसान पहुंचाने के लिए बारूदी सुरंगों का इस्‍तेमाल करते हैं. खैर, सीआरपीएफ का जवान खतरों से खेलना जानता है, लिहाजा लोगों की भलाई के सामने हमें नक्‍सलियों की साजिश का कोई डर नहीं होता है.

 

 

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