ऑनलाइन होंगे अंचल कार्यालय तो खत्म हो जाएगी कैथी लिपि !

ब्रिटिश शासनकाल में कामकाज की मुख्य लिपि रही कैथी खत्म होने के कगार पर पहुंच गई है. 18वीं-19वीं शताब्दी में प्रमुख रूप से प्रयुक्त होने वाली कैथी लिपि फिलहाल अंचल कार्यालयों में जमीन संबंधी दस्तावेजों में देखने को मिलती थी, लेकिन सरकार की तरफ से अंचल कार्यालयों को ऑनलाइन करने के फैसले के बाद यह लिपि खत्म होने के कगार पर है. इस लिपि का वर्तमान में कोई लिखित स्रोत नहीं है और इसके जानकार अब धीरे-धीरे कम हो रहे हैं.

Shailendra
Updated: September 13, 2015, 1:53 PM IST
ऑनलाइन होंगे अंचल कार्यालय तो खत्म हो जाएगी कैथी लिपि !
ब्रिटिश शासनकाल में कामकाज की मुख्य लिपि रही कैथी खत्म होने के कगार पर पहुंच गई है. 18वीं-19वीं शताब्दी में प्रमुख रूप से प्रयुक्त होने वाली कैथी लिपि फिलहाल अंचल कार्यालयों में जमीन संबंधी दस्तावेजों में देखने को मिलती थी, लेकिन सरकार की तरफ से अंचल कार्यालयों को ऑनलाइन करने के फैसले के बाद यह लिपि खत्म होने के कगार पर है. इस लिपि का वर्तमान में कोई लिखित स्रोत नहीं है और इसके जानकार अब धीरे-धीरे कम हो रहे हैं.
Shailendra
Updated: September 13, 2015, 1:53 PM IST
ब्रिटिश शासनकाल में कामकाज की मुख्य लिपि रही कैथी खत्म होने के कगार पर पहुंच गई है. 18वीं-19वीं शताब्दी में प्रमुख रूप से प्रयुक्त होने वाली कैथी लिपि फिलहाल अंचल कार्यालयों में जमीन संबंधी दस्तावेजों में देखने को मिलती थी, लेकिन सरकार की तरफ से अंचल कार्यालयों को ऑनलाइन करने के फैसले के बाद यह लिपि खत्म होने के कगार पर है. इस लिपि का वर्तमान में कोई लिखित स्रोत नहीं है और इसके जानकार अब धीरे-धीरे कम हो रहे हैं.

अंग्रेजी शासनकाल में थी दस्तावेज की भाषा

खूंटी व्यवहार न्यायालय परिसर में यूं तो कामकाज बेहद सामान्य तरीके से दिन-प्रतिदिन हो रहे हैं,लेकिन इस कामकाज में ही दो सौ साल पुरानी एक पहचान धीरे-धीरे लुप्त हो रही है. यह पहचान है कैथी लिपि की. अंग्रेजों के शासनकाल में लिखित जानकारियों की मुख्य लिपि मानी जाने वाली कैथी लिपि न्यायालय से संबंधित कार्यों के अलावा अंचलों के जमीन संबंधी सभी प्रकार के दस्तावेजों में भी मुख्य रूप से अंकित होते थे और इसके जरिए ही कामकाज होता था. पूर्व क्लर्क और कैथी लिपि के जानकार जॉनी अंसारी का कहना है कि जमींदारी प्रथा के खत्म होने से इस लिपि के जानकारों की संख्या और कामकाज कम होने लगे. उस दौर में कैथी हालांकि स्कूलों में पढाई जाती थी, लेकिन स्वतंत्रता बाद इसकी संख्या बेहद कम हो गई और आज तो महज दस फीसदी लोगों तक भी इसकी पहुंच नही रह गई है. कैथी लिपि किताबों से खत्म होकर सिर्फ चंद लोगों के जबान पर रह गई है.

खत्म हो जाएंगे जानकार

इस लिपि के खत्म होने के कगार पर पहुंचने की एक वजह सरकार की तरफ से अंचल कार्यालयों को आनलाइन करने की कवायद भी है, जिसमें कैथी लिपि में लिखी जमीन संबंधी सभी दस्तावेज जानकारों के माध्यम से कंप्यूटर में हिन्ही भाषा में दर्ज कराए जा रहे हैं. कैथी लिपि के जानकार सचिन्द्र महतो व परवेज आलम का कहना है कि उन्होंने सिर्फ लोगों को सुनते और उनके साथ काम करते करते सीखी है.लेकिन वर्तमान पीढी इससे दूर होती जा रही है जिससे लिपि भले ही कुछ जगहों पर मौजूद रहे लेकिन इसके जानकार खत्म हो जाएंगे.  झारखंड विविधि संस्कृतियों,भाषाओं और लिपियों का प्रदेश माना जाता है. लेकिन जिस प्रकार से आधुनिक समय में कामकाज में तकनीकीकरण का दौर बढा है, उससे हमारी संस्कृतियां एवं विरासत भी प्रभावित हुई है और अब उनके अस्तित्व पर भी सवाल खड़ा होने लग गया है.
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