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झारखंड: मेले में मुर्गे की 'बाजीगरी', हारने पर मिलती है मौत..जीतने पर जिंदगी

झारखंड: मेले में मुर्गे की 'बाजीगरी', हारने पर मिलती है मौत..जीतने पर जिंदगी

झारखंड के ग्रामीण इलाकों में मुर्गे की लड़ाई परंपरा का हिस्सा है.

झारखंड के ग्रामीण इलाकों में मुर्गे की लड़ाई परंपरा का हिस्सा है.

Jharkhand News: मुर्गा पाड़ा का खेल आदिवासी संस्कृति से जुड़ा हुआ है. हालांकि अब इस खेल में अन्य समाज के लोग भी शामिल होकर उत्सव मनाते हैं. मुर्गा पाड़ा में दो मुर्गे की लड़ाई पर हजारों लोग बाजी लगाते हैं. जीतने वाले मुर्गे को जिंदगी और हारने वाले को मौत मिलती है.

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रिपोर्ट- प्रभंजन कुमार

घाटशिला. मकर संक्रांति और टुसू उत्सव पर पूर्वी सिंहभूम के ग्रामीण इलाके में टुसू मेले का आयोजन किया जाता है. इस दौरान सबसे बड़ा आकर्षण का केन्द्र रहता है मुर्गा पाड़ा. मुर्गा पाड़ा में मुर्गों की लड़ाई होती है. इस लड़ाई में हारने वाले मुर्गे को मिलती है मौत, तो जीतने वाले को जिन्दगी. मुर्गा पाड़ा में लोग लाखों की बाजी अपने- अपने मुर्गे पर लगाते हैं. दूर-दूर से आये बाज़ीगर अपने मुर्गे के लिए साइज के अनुसार प्रतिद्वंद्वी चुनते हैं. इसके बाद तय होता है कि जितने वाले मुर्गे को हारने वाले मुर्गे के साथ कितने रुपये मिलेंगे. इसके बाद दोनों मुर्गे को अखाड़ा में लड़ाई के लिए उतारा जाता है.

मुर्गों के पैर में बांधे जाते हैं धारदार छुरी
लड़ाई से पहले मुर्गों के पैर में धारदार छुरी बांधी जाती है. छुरी बांधने का काम कांतकर करते है. बड़ी ही सावधानी से मुर्गा के पैर में छुरी बांधने के बाद उसे लड़ाई के मैदान मे उतारा जाता है. मुर्गे की लड़ाई तब तक होती है जबतक किसी एक मुर्गा की मौत नही हो जाती. लड़ाई के दौरान सैकड़ों की संख्या मे लोग घेरा बनाकर लड़ने वाले मुर्गों पर बाजी लगाते है . बाजी लगाने वाले बाज़ीगर जोर-जोर से आवाज लगाकर मुर्गे की लड़ाई का आनंद उठाते है.

बाज़ीगर को रहता है टुसू मेला का इंतजार
मुर्गे की लड़ाई के लिये बाजीगरों को टुसू मेला का इंतजार रहता है . पूरे सालभर अपने मुर्गे की देखभाल करते है . लड़ाई के पैतरे मुर्गे को सिखाये जाते है. गांव के दूसरे मुर्गे के साथ उसे लड़ाया जाता है, जिससे मुर्गा तेज और लड़ाई के पैतरे सीख सके. लड़ने वाले मुर्गा की अच्छी देखभाल होती है. खाने के लिये उसे धान दिये जाते है, ताकि मुर्गा हट्टा कट्टा और तगड़ा बन सके. सालभर मुर्गा को लड़ाई के गुर सिखाने के बाद उसे टुसू मेले के मुर्गा पाड़ा में लड़ाई के लिये उतारा जाता है.

आदिवासी संस्कृति से जुड़ा है मुर्गा पाड़ा
मुर्गा पाड़ा का खेल आदिवासी संस्कृति से जुड़ा हुआ है. आदिवासी समाज में किसी तरह का कोई भी उत्सव हो मुर्गा पाड़ा का आयोजन अवश्य होता है. हालांकि अब इस खेल में अन्य समाज के लोग भी शामिल होकर उत्सव मनाते हैं. मुर्गा पाड़ा में दो मुर्गे की लड़ाई पर हजारों लोग बाजी लगाते है. मुर्गा पाड़ा का आयोजन सबसे अधिक टुसू पर्व के दौरान ही होता है. पूरे एक महीने तक यह टुसू मेला विभिन्न गांव में आयोजित होता है, जिसमे मुर्गे के साथ पहुंचते है बाज़ीगर.

Tags: Ghatshila, Jamshedpur news, Jharkhand news

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