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झारखंडः ट्रैफिक सिग्नल पर दिव्यांग बाजेवाला के माउथ ऑर्गन की धुन सुनकर ठहर जाएंगे आप!

जमशेदपुर के बेल्डीह क्लब के पास सिग्नल के नजदीक जब दिव्यांग आनंद राव माउथ ऑर्गन बजाते हैं तब लोगों की निगाहें उनपर ठहर जाती है और उनकी संगीत को सुनने लगते हैं.

जमशेदपुर के बेल्डीह क्लब के पास सिग्नल के नजदीक जब दिव्यांग आनंद राव माउथ ऑर्गन बजाते हैं तब लोगों की निगाहें उनपर ठहर जाती है और उनकी संगीत को सुनने लगते हैं.

झारखंड के जमशेदपुर (Jamshedpur) में एक ट्रैफिक सिग्नल के पास बैठकर जब दिव्यांग आनंद राव माउथ ऑर्गन (Mouth Organ) बजाते हैं, तो आने-जाने वालों के कदम ठहर जाते हैं. माउथ ऑर्गन की सुरीली धुन में लोग खो जाते हैं.

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जमशेदपुर. एक छोटा सा शरीर है और चार दिन का मेहमान हूं. एक दिन तो दुनिया से चले जाना है. यह कहकर रो पड़ते हैं माउथ ऑर्गन (Mouth Organ) बजाने वाले दिव्यांग आनंद राव (Physically Challenged Anand rao). लौहनगरी कहे जाने वाले जमशेदपुर में एक ट्रैफिक सिग्नल के पास बैठकर जब आनंद माउथ ऑर्गन बजाते हैं, तो आने-जाने वालों के कदम ठहर जाते हैं. माउथ ऑर्गन की सुरीली धुन में लोग खो जाते हैं.

हादसे में पैर हुआ खराब
दरअसल, 5 साल पहले एक दुर्घटना में आनंद राव का पैर खराब हो गया. उसी समय से वह लाचार हो गए मगर उन्होंने जीने की आस नहीं छोड़ी और न ही हारी हिम्मत. वह कहते हैं- आशा एक बहुत बड़ी आशा है और इसी आशा को लेकर बैठा हूं. उन्हें आशा है कि कोई उन्हें एक छोटी सी जगह रहने के लिए दे देगा जहां वह बच्चों को संगीत (Music) भी सिखा पाएंगे और ऐसे ही उनका समय भी कट जाएगा. वह यह भी चाहते हैं कि बस कोई उनकी मुलाकात एक ऑर्केस्ट्रा टीम (Orchestra team) से करवा दे, फिर अपने आगे के जीवन का भाग्य वह खुद लिख लेंगे.

... उनकी संगीत सुनने के लिए ठहर जाते हैं राहगीर
दिव्यांग आनंद राव एक लाठी के सहारे उठते-बैठते हैं और साइकिल पर चलते हैं. जब वह जमशेदपुर के बेल्डीह क्लब के पास स्थित सिग्नल के नजदीक माउथ ऑर्गन बजाते हैं, तब लोगों की निगाहें उन पर ठहर जाती हैं. लोग उनका संगीत सुनने लगते हैं. आनंद राव माउथ ऑर्गन के अलावा स्पैनिश गिटार और अन्य कई वाद्ययंत्र बजाते हैं.


माउथ ऑर्गन बजाने वाले दिव्यांग आनंद राव यह कहकर रो पड़ते हैं कि चार दिन का मेहमान हूं और एक दिन तो दुनिया से चले जाना है.


घर-परिवार छूटा, हिम्मत नहीं हारी
आनंद राव का अपना घर नहीं है. वे बताते हैं कि कुछ साल पहले तक वे अपने परिवार के साथ सोनारी में रहते थे. लेकिन किसी कारणवश घर टूटने के बाद घरवाले वापस विशाखापट्नम चले गए और आनंद राव को ऐसे ही छोड़ गए. इतना ही नहीं, इसके बाद आनंद राव की नौकरी भी छूट गई और वह धीरे-धीरे सड़क पर आ गए. 1964 से माउथ ऑर्गन बजा रहे आनंद राव ने कहा कि उन्होंने होटलों में वेटर का काम किया और जूठे बर्तन भी धोए, लेकिन हिम्मत नहीं हारी. अब आनंद राव रात में साकची भूतनाथ मंदिर में रहते हैं और दिन में इसी जगह पर माउथ ऑर्गन बजाकर अपना जीवन चलाते हैं. यहां से आते-जाते लोग उन्हें कुछ पैसे दे देते हैं और उनका गुजारा हो जाता है.

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