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खूंटी: 7 महिलाओं ने मिलकर अपनी और गांव की बदल दी तकदीर, बांस से बनाती हैं सजावट के सामान

केलो गांव की इन महिलाओं से प्रेरित होकर आस-पास के गांव की महिलाएं भी बांस का सामान बनाने के लिए प्रशिक्षण ले रही हैं.

केलो गांव की इन महिलाओं से प्रेरित होकर आस-पास के गांव की महिलाएं भी बांस का सामान बनाने के लिए प्रशिक्षण ले रही हैं.

Khunti News: जयपुर पंचायत के केलो गांव में इन दिनों 7 महिलाएं समूह बनाकर बांस के अलग-अलग सामान बनाकर सुर्खियां बटोर रही हैं. इन सामानों को बेचकर इन महिलाओं को हर महीने 5 से 6 हजार की आमदनी हो जाती है.

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खूंटी. पहचान बदलने की शुरुआत एक छोटे से प्रयास से शुरू होती है. और आगे चलकर यही प्रयास एक बड़े कारवां में बदल जाता है. झारखंड के खूंटी जिले के केलो गांव की सात महिलाएं आज अपने हुनर से खुद की पहचान बनाकर आत्मनिर्भर बनने में जुटी हैं. इनका काम आसपास के इलाकों में धीरे-धीरे चर्चा का विषय बनता जा रहा है.

खूंटी के रनिया प्रखंड के केलो गांव जाने वाले रास्ते में कारो नदी का शोर किसी बड़ी सामाजिक क्रांति की कहानी को बयां कर रहा है. जयपुर पंचायत के केलो गांव में इन दिनों 7 महिलाएं समूह बनाकर बांस के अलग-अलग सामान बनाकर सुर्खियां बटोर रही हैं. समूह का संचालन मीरा देवी के हाथों में है. मीरा ने आज से 3 साल पहले 2018 में इस काम की शुरुआत की थी. बाद में धीरे-धीरे गांव की महिलाएं उनसे जुड़ने लगीं और आज 7 महिलाओं का समूह स्वावलंबन की एक बड़ी कहानी लिखने में मशरूफ है.

यह महिलाएं बांस से बने कई सामानों को बनाती हैं. इसमें खिलौने, घर के सजावट के सामान, तरह-तरह के लैंप, गुल्लक, श्रृंगार रखने का सामान बेहद बारीकी से बनाया जाता है. एक दिन में एक महिला बांस के दो सामान बना लेती हैं. इस तरह हर दिन बारीकी और खूबसूरती के साथ कुल 14 सामान तैयार किए जाते हैं. इन सामानों को बनाकर महिलाओं को हर महीने 5 से 6 हजार की आमदनी हो जाती है. लेकिन आमदनी का यह सिलसिला हर महीने मुमकिन नहीं हो पाता. क्योंकि बाजार उपलब्ध नहीं होने की वजह से सामानों को बिकने में काफी परेशानी आती है.

आदर्श बांस कारीगर समिति की संचालक मीरा देवी बताती हैं कि पूंजी की समस्या तो पहले से है ही. मेहनत के बावजूद समूह को मुकम्मल बाजार नहीं मिल पाने से सामानों की बिक्री नहीं हो पा रही. मीरा के साथ ही काम करने वाली सुशीला कंडुलना की माने तो आर्थिक स्थिति पहले से काफी सुधरी है. लेकिन आमदनी उतनी नहीं हो पा रही जितनी होनी चाहिए.

मीरा देवी के साथ काम करने वाली महिलाएं उस दिन का इंतजार कर रही हैं, जब उनके बनाए सामानों की बिक्री के लिए राज्य सरकार एक बाजार मुहैया कराएगी. जहां इन सामानों की कीमत महिलाओं की मेहनत के मुताबिक मिल सकेगी. बांस के इन सामानों को बनाने में गांव की तुरी जाति की महिलाओं के साथ साथ लोहरा और आदिवासी समाज की महिलाएं भी शामिल हैंं.. महिलाओं की मानें तो इस काम से जुड़ने के बाद उनके घर की आर्थिक हालत पहले से काफी सुधरी है. और वह अपने कमाए पैसों को अपनी इच्छा के मुताबिक खर्च कर पा रही हैं.

महज ढाई सौ की आबादी वाले खूंटी के केलो गांव में नारी सशक्तिकरण की राह धीरे-धीरे आगे बढ़ रही है. पूंजी की कमी और बाजार नहीं मिलने की वजह से थोड़ी हताशा जरूर है.लेकिन हौसला नहीं टूटा है. यही वजह है कि गांव में भी महिलाओं को देखने का नजरिया अब बदल चुका है. केलो गांव के आसपास कई और टोले हैं, जहां केलो गांव की महिलाओं का नाम सुर्खियों में है. इन गांव की महिलाएं भी जल्द ही अब प्रशिक्षण लेकर बांस से जुड़े सामानों को बनाकर अपनी आमदनी बढ़ाना चाहती हैं.

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