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झारखंडः घर में खाने को पैसे नहीं, मड़ुआ बेचकर खरीदी हॉकी स्टिक, अब अमेरिका में लेगी ट्रेनिंग

पुंडी हर रोज साइकिल से गांव से 8 किमी दूर खूंटी का बिरसा मैदान हॉकी खेलने जाती है.

पुंडी हर रोज साइकिल से गांव से 8 किमी दूर खूंटी का बिरसा मैदान हॉकी खेलने जाती है.

झारखंड (Jharkhand) की हॉकी (Hockey) खिलाड़ी पुंडी सारू (Pundi Saru) बताती हैं कि आर्थिक तंगी की वजह से स्कॉलरशिप और घर का मड़ुआ बेचकर आए पैसों से उसने हॉकी स्टिक खरीदी. रांची में आयोजित प्रशिक्षण शिविर में अमेरिका जाने के लिए हुआ चयन.

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खूंटी. नक्सल प्रभावित (Naxal Affected) जिले के एक छोटे से गांव हेसल से निकलकर पुंडी सारू (Pundi Saru) अब अपने सपनों की उड़ान भरने अमेरिका जाने वाली है. लेकिन इसके लिए पुंडी को मुश्किलों के पहाड़ से मुकाबला करना पड़ा. गरीबी के कारण बड़े भाई की पढ़ाई छूट गई. पिछले साल मैट्रिक परीक्षा में फेल हो जाने के कारण बड़ी बहन ने खुदकुशी (Suicide) कर ली. एक के बाद एक परेशानी से पुंडी मानो टूट चुकी थी. दो महीने तक उसने हॉकी (Hockey) स्टिक को पकड़ा तक नहीं. लेकिन हॉकी को भूली नहीं.

स्कॉलरशिप का पैसा काम आया
पुंडी बताती है कि जब तीन साल पहले उसने हॉकी खेलना शुरू किया था. तब उसकी आंखों में बड़े सपने थे, लेकिन हॉकी स्टिक नहीं थी. खरीदने के लिए घर में पैसे भी नहीं थे. खाने का मड़ुआ (Finger millet) बेचकर और छात्रवृत्ति में मिले रुपए से उसने किसी तरह हॉकी स्टिक खरीदी. आपको बता दें कि बिहार और झारखंड के ग्रामीण इलाकों में मड़ुआ का आटा खूब इस्तेमाल किया जाता है. शहरों में इसे रागी के नाम से जाना पहचाना जाता है, वहां भी लोग इससे बने आटा या बिस्किट का इस्तेमाल होने लगा है.

रोज 8 किमी साइकिल चलाकर हॉकी खेलने जाती है
पुंडी के मुताबिक वह हर रोज साइकिल से गांव से 8 किमी दूर खूंटी के बिरसा मैदान हॉकी खेलने जाती है. वह कई पदक जीत चुकी है. अमेरिका जाने के सवाल पर पुंडी कहती है कि हॉकी स्टिक खरीदने से लेकर मैदान में खेलने तक उसे काफी संघर्ष करना पड़ा. अमेरिका जाना ही सिर्फ लक्ष्य नहीं, बल्कि निक्की प्रधान की तरह देश के लिए हॉकी खेलना है. पापा खेलने के लिए रोकते थे, पर मां ने हमेशा साथ दिया.



अमेरिका के मिडलबरी कॉलेज, वरमोंट में लेगी ट्रेनिंग
अमेरिका के मिडलबरी कॉलेज, वरमोंट में पुंडी को हॉकी का प्रशिक्षण दिया जाएगा. इसके लिए वह 12 अप्रैल को रांची से रवाना होगी. रांची में आयोजित प्रशिक्षण शिविर में उसका अमेरिका जाने के लिए सलेक्शन हुआ. बेटी की इस सफलता पर मां-बाप की आंखों में गर्व के आंसू हैं. पिता एतवा उरांव अब घर में रहते हैं. पहले मजदूरी करते थे. लेकिन 2012 में खूंटी से घर लौटने के दौरान वह वाहन की चपेट में आ गए, जिससे हाथ टूट गया. तब से परिवार का पूरा खर्च मां ही चलाती हैं. नौवीं कक्षा की छात्रा पुंडी के साथ पेलोल उत्क्रमित उच्च विद्यालय की 10वीं की छात्रा जुही कुमारी भी अमेरिका जाने वाली है. जुही के पिता मछुआरा हैं. दोनों बच्चियों की प्रतिभा पर स्कूल के शिक्षकों को गर्व है.

इनपुट- अरविंद कुमार

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