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प्यास बुझाने के लिए झारखंड के इस गांव में लोगों ने अपनाया देशी तरीका

ETV Bihar/Jharkhand
Updated: April 25, 2017, 1:30 PM IST
प्यास बुझाने के लिए झारखंड के इस गांव में लोगों ने अपनाया देशी तरीका
कुकरू डाड़ी से पानी भरती एक महिला.

विकास के नए-नए प्रतिमान स्थापित करने वाले झारखंड का एक गांव करीब ढाई दशक से पानी की जरूरतों को पूरा करने के लिए देशी जुगाड़ पर निर्भर है. यहां के लोग 'कुकरू डाड़ी' के सहारे अपनी प्यास बुझा रहे हैं.

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विकास के नए-नए प्रतिमान स्थापित करने वाले झारखंड का एक गांव करीब ढाई दशक से पानी की जरूरतों को पूरा करने के लिए देशी जुगाड़ पर निर्भर है. यहां के लोग 'कुकरू डाड़ी' के सहारे अपनी प्यास बुझा रहे हैं.

खूंटी जिले के मुंडा बहुल रूगड़ी गांव में पेयजल की सरकारी योजनाओं के विफल हो जाने के बाद ग्रामीणों ने पानी के लिए परंपरागत स्रोत का ही इस्तेमाल करते हैं.

खूंटी से उलीहातु जाने के दौरान रास्ते में मौजूद इस गांव की आबादी लगभग एक हजार है. गांव में पीने के पानी के साधन के रूप में पेयजल विभाग की ओर से सिर्फ तीन चापाकल उपलब्ध कराए गए थे, जिसमें से सिर्फ एक ठीक हैं. वहां के लोग पानी के लिए अपने परंपरागत साधन 'कुकरू डाड़ी' के सहारे प्यास बुझाने की कोशिश कर रहे हैं.

पीने के पानी से लेकर नहाने एवं अन्य कामों के लिए ग्रामीण इसी कुकरू डाड़ी का प्रयोग पिछले 25 सालों से करते आ रहे हैं. इसके प्रयोग को लेकर ग्रामीणों की कई धार्मिक मान्यताएं भी हैं.

प्रशासन का कहना है कि गांवों में पानी पहुंचाने के लिए मनरेगा के तहत काम किया जा रहा है. वहीं रूगड़ी गांव की महिला ललिता मुंडु का कहना है कि सभी लोग इसी 'कुकरू डाड़ी' से पानी निकालते हैं.

स्थानीय पत्रकार अजय शर्मा ने बताया कि पूर्वजों ने पानी की जरूरत पूरा करने के लिए 'कुकरू डाड़ी' बनाया था. उन्होंने एक ऐसी जगह तलाशी थी जहां पर पर्याप्त पानी रहता था. उस जगह पर मात्र छह-सात फीट गड्ढ़ा खोदकर वे लोग वहां जामून या महुआ के मोटे पेड़ों को खोखला कर गाड़ देते थे. पाइप नुमा खोखले पेड़ से पानी ऊपर आ जाता है और लोग उसमें से पानी भरने लगते हैं.

पानी की जरूरत पूरा करने के कारण ग्रामीण इस 'कुकरू डाड़ी' की पूजा करते हैं. ग्रामीण इसी 'कुकरू डाड़ी' के सहारे पानी पीते हैं.

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First published: April 25, 2017, 1:30 PM IST
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