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'नाम नहीं आंधी है - झारखंड का गांधी है' राज्य के 3 बार CM ऐसे ही नहीं रहे शिबू सोरेन

News18Hindi
Updated: November 19, 2019, 12:19 PM IST
'नाम नहीं आंधी है - झारखंड का गांधी है' राज्य के 3 बार CM ऐसे ही नहीं रहे शिबू सोरेन
शिबू सोरेन झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री रह चुके हैं.

गुरू जी के नाम से राज्य में विख्यात शिबू सोरेन (Shibu Soren) का विवादों से पुराना नाता रहा है. लेकिन इसके बाद भी शिबू सोरेन राजनीति में खासा प्रभावशाली हैं. ऐसे में क्या इस बार उनका सिक्का चल पाएगा?

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  • Last Updated: November 19, 2019, 12:19 PM IST
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झारखंड के संथाल बेल्ट में शिबू सोरेन लोगों के दिलों में इस तरह राज करते रहे हैं कि लोग उनकी तुलना राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से करने में परहेज नहीं करते हैं. शिबू सोरेन की यही लोकप्रियता उन्हें दुमका से आठ बार लोकसभा जिताने की वजह रही है तो इसी ख्याति के चलते वो सूबे के मुख्यमंत्री के तौर पर वो तीन बार काबिज हुए हैं.

साल 1980 में जब इंदिरा गांधी की लोकप्रियता वापस चरम पर थी तब कांग्रेस के विजयी-रथ को शिबू सोरेन ने दुमका में रोक कर अपनी जीत का परचम लहराया था. शिबू सोरेन इस जीत के बाद लोगों के बीच ऐसे लोकप्रिय हुए कि उन्होंने अपनी अलग पार्टी बना ली जो कि अब राज्य की दो प्रमुख पार्टियों में से एक मानी जाती है.

शिबू सोरेन ने आदिवासियों के हक की लड़ाई सियासी हथियार से लड़ी. राज्य की खनिज संपदा से लेकर जल, जमीन और जंगल पर आदिवासियों के पहले हक के लिए वो हमेशा आवाज़ उठाते रहे. जब साल 2016 में सरकार छोटानागपुर टिनेंसी एक्ट और संथाल परगना टिनेंसी एक्ट में बदलाव कर जनहित से जुड़े कामों को शुरू करने की योजना बना रही थी तो शिबू सोरेन की पार्टी ने इसका कड़ा विरोध ज़ताया.

गुरू जी के नाम से राज्य में विख्यात शिबू सोरेन का विवादों से पुराना नाता रहा है. उन पर अपने ही निजी सचिव शशिकांत झा की हत्या का आरोप लग चुका है जिसके लिए निचली अदालत ने उन्हें दोषी करार दिया था. साल 2006 में मनमोहन सरकार में कोयला मंत्री के पद पर विराजमान शिबू सोरेन को मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था. साल 1970 में आदिवासी नेता के तौर पर सुर्खियों में आए शिबू सोरेन को साल 1975 में भी गैर-आदिवासियों को राज्य से बाहर खदेड़ने को लेकर मुहिम शुरू किए जाने को लेकर आपराधिक मुकदमा झेलना पड़ा था. इस मुहिम में सात लोगों की जान गई थी और शिबू सोरेन इसको लेकर खासे विवादों में रहे थे. 30 साल पहले के एक अन्य मामले में शिबू सोरेन 69 लोगों के साथ आरोपी बनाए गए थे जिनमें 10 लोगों की हत्या हुई थी.

शिबू सोरेन 8 बार लोकसभा का चुनाव जीत चुके हैं लेकिन नौवीं बार गुरूजी को अपने ही शिष्य से हार का सामना करना पड़ा. साल 2019 के लोकसभा चुनाव में शिबू सोरेन को बीजेपी के सुनील सोरेन ने 47 हजार वोटों से हरा दिया. हालांकि साल 2014 में वो मोदी की आंधी के बावजूद सुनील सोरेन से जीत गए थे लेकिन मोदी की दूसरी आंधी का प्रकोप शिबू सोरेन झेल नहीं पाए और दुमका लोकसभा से चुनाव हार गए.

शिबू सोरेन पहला लोकसभा चुनाव साल 1977 में लड़े थे लेकिन उन्हें इसमें हार का सामना करना पड़ा. साल 1980 में गुरू जी चुनाव जीतने में कामयाब रहे और फिर ये सिलसिला 1989,1991 और 1996 तक बरकरार रहा. साल 2002 में शिबू सोरेन राज्यसभा भेजे गए गए लेकिन दुमका से उसी साल उपचुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे. साल 2004 में फिर से लोकसभा चुनाव जीतकर शिबू सोरेन मनमोहन सरकार में मंत्री बने. लेकिन साल 2006 में निचली अदालत से सज़ा मिलने की वजह से मंत्री पद गंवाना पड़ा. इसके बाद साल 2008 में उन्हें हाईकोर्ट ने तमाम आरोपों से बरी कर दिया.

शिबू सोरेन की पार्टी अब विधानसभा चुनाव में सारी ताकत लगा कर खोई हुई ज़मीन को हासिल करने में जुटी हुई है. सोरेन को ये उम्मीद है कि विधानसभा चुनाव में जनता स्थानीय मुद्दों को तरजीह देगी जिसका लाभ झारखंड मुक्ति मोर्चा को जरूर मिलेगा.
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शिबू सोरेन की राजनीति विरासत हेमंत सोरेन के कंधे पर हैं वहीं उनके दूसरे बेट बसंत सोरेन युवाओं की राजनीति में सक्रिय भूमिका निझा रहे हैं जबकि तीसरे पुत्र दुर्गा सोरेन का कुछ साल पहले निधन हो चुका है. शिबू सोरेन की बेटी अंजली सोरेन भी साल 2019 का लोकसभा चुनाव हार चुकी है. देखने वाली बात होगी कि परिवारवाद की राजनीति के दौर में शिबू सोरेन की विरासत को उनके परिवार के लोग कितना संभाल पाते हैं.

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First published: November 19, 2019, 12:19 PM IST
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