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Lok Sabha Election 2019: क्या इस बार 'बॉक्साइट की नगरी' में खत्म होगा कांग्रेस का वनवास?

News18 Jharkhand
Updated: April 29, 2019, 7:10 AM IST
Lok Sabha Election 2019: क्या इस बार 'बॉक्साइट की नगरी' में खत्म होगा कांग्रेस का वनवास?
लोहरदगा में किसके सिर सजेगा जीत का ताज?

लोहरदगा लोकसभा सीट पर 1962 में पहली बार चुनाव हुआ. 1991 में यहां पहली बार कमल खिला. उसके बाद से बीजेपी की जीत जारी है.

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झारखंड की लोहरदगा सीट पर आज मतदान हो रहा है. यहां के 12,27,510 मतदाता अपने लिए नये सांसद का फैसला आज कर लेंगे. इस सीट पर बीजेपी के सुदर्शन भगत और कांग्रेस के सुखदेव भगत में सीधा मुकाबला देखा जा रहा है. सुदर्शन भगत मोदी सरकार में मंत्री हैं और यहां से दो बार सांसद रह चुके हैं. वहीं कांग्रेस के सुखदेव भगत पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं. वर्तमान में विधायक भी हैं. इस बार विधानसभा से संसद का सफर तय करने के लिए जोर लगा रहे हैं.

'लोर-ए-यादगा' से पड़ा लोहरदगा नाम 

झारखंड के दक्षिण-पश्चिम भाग में स्थित है लोहरदगा. लोहरदगा का शाब्दिक अर्थ होता है खनिज का क्षेत्र. सम्राट अकबर पर लिखी पुस्तक आइन-ए-अकबरी में भी किस्मत-ए-लोहरदगा का उल्लेख है. कहा जाता है कि भगवान महावीर इस इलाके में ठहरे थे. जिस स्थान पर भगवान महावीर ठहरे थे, उसे 'लोर-ए-यादगा' के नाम से जाना जाता है. स्थानीय मुंडारी भाषा में इसका मतलब आंसुओं की नदी होता है. यहां प्रागैतिहासिक काल के मानव बस्तियों के भी अवशेष मिले हैं, जिससे इसकी पुष्टि होती है कि यहां हजारों साल पहले भी इंसानी सभ्यता थी.

लोहरदगा में बॉक्साइट- लिग्नाइट का भंडार 

लोहरदगा लोकसभा क्षेत्र का पूरा इलाका वन, पहाड़ और पठार से भरा हुआ है. इस इलाके में बॉक्साइट और लिग्नाइट प्रचूर मात्रा में पाये जाते हैं. बावजूद इसके इलाके की पहचान आर्थिक रूप से पिछड़े इलाके के रूप में होती है. यह क्षेत्र अनुसूचित जनजाति बहुल इलाका है और यह सीट एसटी के लिए आरक्षित है. लोहरदगा सीट रांची, गुमला और लोहरदगा जिले में फैला हुआ है. लोहरदगा, रांची का मांडर और गुमला जिले का गुमला, विशुनपुर और सिसई मिलकर लोहरदगा संसदीय क्षेत्र बना है. लोहरदगा लोकसभा सीट में पड़ने वाले सभी विधानसभा क्षेत्र भी अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं. बीते 25 वर्ष के चुनाव पर नजर डालें, तो यहां कांग्रेस- बीजेपी के बीच टक्कर होती रही है. पिछले दो चुनावों में बीजेपी के सुदर्शन भगत ने जीत दर्ज कराई है. सुदर्शन भगत मोदी सरकार में मंत्री भी हैं.

1991 से बीजेपी का कब्जा 

लोहरदगा लोकसभा सीट पर 1962 में पहली बार चुनाव हुआ. 1962, 1967, 1971 में लगतार तीन बार यहां कांग्रेस जीती. 1977 की इमरजेंसी के बाद इस क्षेत्र में कांग्रेस की पकड़ कमजोर हुई. 1977 में जनता पार्टी जीती. लेकिन उसके बाद 1980, 1984, 1989 में फिर कांग्रेस को जीत हासिल हुई. 1991 में यहां पहली बार कमल खिला. तब से यहां मुकाबला कांग्रेस और बीजेपी के बीच होता रहा है. 1996, 1999, 2009 और 2014 में बीजेपी को जीत मिली.
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64 फीसदी वोटर एसटी हैं

बॉक्साइट के अलावा कार्तिक उरांव और गुमला के परमवीर अल्बर्ट एक्का के कारण इस इलाके को पहचान मिली. कार्तिक उरांव ने लोहरदगा लोकसभा क्षेत्र और आदिवासियों के उत्थान के लिए काफी काम किया. आज भी कांग्रेस यहां कार्तिक उरांव के सपनों को पूरा करने के नाम पर वोट मांगती है. लोहरदगा लोकसभा क्षेत्र में करीब 64 फीसदी ST वोटर हैं. इस सीट की 96 फीसदी आबादी गांवों में रहती है, जो खेती और जंगल में लकड़ी काटकर अपना गुजर-बसर करती है. क्षेत्र में रोजगार के साधन नहीं हैं, जिसका असर यहां के लोगों के जन- जीवन पर दिखता है. जंगल की लकड़ी बेचकर बड़ी आबादी का घर चलता है.

मानव तस्करी बड़ी समस्या 

आदिवासी भोले-भाले और सीधे-सादे होते हैं. गरीबी में जकड़े ये लोग मानव तस्करों के शॉफ्ट टार्गेट होते हैं. गुमला और लोहरदगा में मानव तस्करी एक बड़ी समस्या है. हाल के दिनों में मानव तस्करी की घटनाएं कम हुईं हैं. लेकिन पूरी तरह से खत्म नहीं हुई. लोहरदगा के एक मात्र महिला कॉलेज के बंद होने से यहां आक्रोश है. यहां की लड़कियों को ग्रेजुएशन की पढ़ाई के लिए रांची जाना पड़ता है. छात्राओं का आरोप है कि सांसद ने महिला कॉलेज को दोबारा खुलवाने की कोशिश नहीं की. लोहरदगा लोकसभा क्षेत्र में उद्योग धंधों का घोर अभाव है. बॉक्साइट का खनन तो यहां होता है, लेकिन इस पर आधारित उद्योग नहीं हैं. इसके कारण बेरोजगारी और पलायन भी यहां की बड़ी समस्याएं हैं. लोहरदगा चेम्बर ऑफ कॉमर्स से जुड़े लोगों का कहना है कि सांसद सुदर्शन भगत ने नये उद्योग लगाने की पहल नहीं की.

हाल के दिनों में नक्सलियों पर लगा लगाम

लोहरदगा शहर के लोग सालों से जाम की समस्या से जूझ रहे हैं. बाइपास बनाने की मांग वर्षों पुरानी है. लोहरदगा और गुमला में हॉकी और फुटबॉल का क्रेज रहा है. यहां के कई खिलाड़ी राज्य और देश का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं. लेकिन इसके बाद भी यहां ढंग का स्टेडियम नहीं है. खिलाड़ियों को बुनियादी सुविधाएं नहीं मिलती. लोकसभा क्षेत्र का पूरा इलाका रेड कॉरिडोर का हिस्सा है. हालांकि हाल के दिनों में नक्सलियों पर लगाम कसा गया है. साथ ही सड़क और बिजली की स्थिति भी पहले से बेहतर हुई है. लोहरदगा लोकसभा क्षेत्र में समाज के हर तबके के लोगों की अपनी-अपनी समस्याएं हैं और उनके अपने-अपने मुद्दे हैं.

क्षेत्र के विकास का सांसद का दावा

सुदर्शन भगत साल 2000 में झारखंड बनने से पहले संयुक्त बिहार में पहली बार विधायक बने थे. जब झारखंड अलग राज्य बना तो वह शिक्षा राज्य मंत्री बनाए गए. 2009 और 2014 में लोहरदगा के सांसद चुने गए. 2014 में मोदी सरकार में केन्द्रीय राज्यमंत्री बने. पहले उन्हें कृषि मंत्रालय का राज्यमंत्री बनाया गया. बाद में आदिवासी मामलों के मंत्रालय के राज्यमंत्री बने. जनवरी 2019 तक के आंकड़ें के मुताबिक सुदर्शन भगत ने अपने सांसद निधि की 89 फीसदी राशि खर्च की है. सांसद का दावा है कि उन्होंने अपने कार्यकाल में शहर और गांव दोनों के विकास पर ध्यान दिया. मौजूदा सांसद कई केन्द्रीय योजनाओं को लोहरदगा और गुमला में धरातल पर उतारने का दावा कर रहे हैं. उनका कहना है कि उन्होंने अपने संसदीय क्षेत्र के मुद्दों को लोकसभा में उठाया. लोहरदगा- कोरबा रेललाइन की मांग प्रमुख है.

विरोधी सांसद को बता रहे फ्लॉप

सांसद क्षेत्र में विकास का दावा कर रहे हैं. साथ ही कुछ योजनाओं को धरातल पर नहीं उतार पाने पर खेद भी जता रहे हैं. इधर, मुख्य विरोधी दल कांग्रेस के नेता सांसद सुदर्शन भगत के कार्यकाल को पूरी तरह से फ्लॉप बता रहे हैं. लोहरदगा में सांसद और विरोधियों के अपने-अपने दावे हैं. लेकिन अब गेंद पूरी तरह से जनता के हाथों में है. जनता यहां 29 अप्रैल को ईवीएम का बटन दबाएगी और अपना प्रतिनिधि चुनेगी. लोहरदगा में 12,10,486 वोटर हैं, जिसमें 6,18,000 पुरुष और 5,92,038 महिलाएं हैं. देखना होगा कि इस बार लोहरदगा की जनता किसको जीत का सेहरा पहनाती है.

रिपोर्ट- भुवन किशोर

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First published: April 29, 2019, 3:19 AM IST
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