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झारखंड के नेतरहाट में कहां से आए हिमालयन पाइन ट्री? 100 साल पूरा होने पर जानें रोचक किस्सा

झारखंड के नेतरहाट में कहां से आए हिमालयन पाइन ट्री? 100 साल पूरा होने पर जानें रोचक किस्सा

हिमालयन पाइन ट्री नेतरहाट की खूबसूरती में चार चांद लगा रहे हैं.

हिमालयन पाइन ट्री नेतरहाट की खूबसूरती में चार चांद लगा रहे हैं.

Jharkhand News: अंग्रेजों द्वारा 1920 के दशक में नेतरहाट की सुंदरता बढ़ाने के लिए यह पेड़ हिमाचल से लाकर लगाए गए थे. ब्यूटीफिकेशन के लिए उस दौर में अंग्रेजों ने चीड़ के पेड़ों के अलावा सिल्वर और थूजा जैसे पेड़ भी नेतरहाट में लगाए. चीड़ के पेड़ कोयल व्यू प्वाइंट से लेकर नेतरहाट के कई जगहों पर लगाए गए थे. अब इन पेड़ों के यहां सौ साल पूरे हो चुके हैं.

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    रिपोर्ट- संजय भारती

    पलामू. नेतरहाट की वादियों में लगे लंबे-लंबे पाइन ट्री (चीड़) पर्यटकों का ध्यान अक्सर अपनी ओर खींच लेते हैं. हिमालय के ये स्थानीय पेड़ नेतरहाट में कैसे आए यह राज शायद बहुत कम लोग जानते हैं. जिस तरह से इन चीड़ के पेड़ों ने नेतरहाट को अपना घर बना लिया है, उसे देखकर कभी नहीं लगता कि ये पेड़ कहीं बाहर से लाए गए होंगे. नेतरहाट में चीड़ के पेड़ों के अलावा सिल्वर ओक और थूजा जैसे हिमालयन पेड़ भी दिखाई पड़ते हैं.

    1920 के दशक में लगाए गए पेड़ों के 100 वर्ष पूरे

    पलामू टाइगर रिजर्व के डिप्टी डायरेक्टर मुकेश कुमार ने एक रिपोर्ट के आधार पर बताया कि अंग्रेजों द्वारा 1920 के दशक में नेतरहाट की सुंदरता बढ़ाने के लिए यह पेड़ हिमाचल से लाकर लगाए गए थे. ब्यूटीफिकेशन के लिए उस दौर में अंग्रेजों ने चीड़ के पेड़ों के अलावा सिल्वर और थूजा जैसे पेड़ भी नेतरहाट में लगाए. चीड़ के पेड़ कोयल व्यू प्वाइंट से लेकर नेतरहाट के कई जगहों पर लगाए गए थे. अब इन पेड़ों के यहां सौ साल पूरे हो चुके हैं. आश्चर्य की बात है कि जिस तरह से यहां की भौगोलिक दशाओं को इन पेड़ों ने अपनाया है उसे देखकर कभी नहीं लगता कि ये पेड़ बाहरी हैं. नेतरहाट की सुंदरता में ये पेड़ चार चांद लगाते हैं और दर्शकों के लिए फोटो खिंचवाने की ये पहली पसंद हैं.

    चीड़ के पेड़ स्थानीय तौर पर हिमालय के क्षेत्रों में पाए जाते हैं. इन पेड़ों का विकास 450 मीटर से लेकर 2500 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में देखा जाता है. यह हिमालय में कश्मीर से लेकर अरुणाचल पाए जाते हैं. इनका एक अन्य नाम कोनिफेरस है। भारत में ऊटी सहित कई हिल स्टेशनों में सुंदरता के लिए चीड़ के पेड़ों को लगाया गया है. ऊटी का पाइन फारेस्ट काफी लोकप्रिय भी है. नेतरहाट में 1920 के दशक में लगाए गए ये चीड़ के पेड़ आज विशालकाय रूप धारण कर चुके हैं. यही कारण है कि नेतरहाट में इस जगह को पाइन फारेस्ट कहा जाता है. नेतरहाट की ऊंचाई लगभग 1200 मीटर है जो चीड़ के पेड़ों के लिए उपयुक्त है.

    पलामू टाइगर रिजर्व के डिप्टी डायरेक्टर आईएफएस मुकेश कुमार बताते हैं कि चीड़ के पेड़ों में फरवरी से लेकर अप्रैल तक का महीना फ्लावरिंग सीजन होता है. चीड़ के पेड़ों से इनके बीच सेमल के बीज की तरह ही हवा में उड़ते हैं और एक जगह से दूसरे जगह तक आसानी से चले जाते हैं. चीड़ के पेड़ों की औसत ऊंचाई 25 मीटर तक होती है.

    इनका अधिक फैलाव पलामू- लातेहार के जंगलों के लिए है नुकसानदेह

    पलामू-लातेहार के सीमित क्षेत्रों में ही यह पेड़ दिखाई देते हैं. इस क्षेत्र में इन पेड़ों को नेतरहाट के अलावा महुआडांड़ के ओरसा, पलामू टाइगर रिजर्व के रूद रेस्ट हाउस जैसे जगहों पर लगाया गया है. इनका उपयोग नेतरहाट के क्षेत्रों में सिर्फ ब्यूटीफिकेशन के लिए किया गया है इनका फैलाव पलामू के जंगलों के लिए हानिकारक है क्योंकि इनके नीचे कोई भी पेड़ या पौधा उग नहीं पाता. चीड़ के पेड़ डोमिनेटिंग नेचर के होते हैं जिसके कारण इनके बीज एक जगह से दूसरी जगह पर आसानी से चले जाते हैं जिससे बाकी अन्य पेड़ों की प्रजातियां खतरे में आ सकती हैं. यही कारण है कि इन क्षेत्रों में बहुत सीमित क्षेत्रों में ही चीड़ के पेड़ों को लगाया गया है.

    Tags: Himalaya, Jharkhand news, Palamu news

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