रांची के कांके डैम को प्रदूषणमुक्त बनाने के लिए 200 मछुआरे कर रहे सत्याग्रह

मछुआरों का प्रदर्शन पिछले 15 दिन से जारी है.
मछुआरों का प्रदर्शन पिछले 15 दिन से जारी है.

आंदोलनकारी मछुआरे कांके डैम (Kanke Dam) को प्रदूषणमुक्त बनाने और वर्तमान में मछली मारने को लेकर की गई टेंडर व्यवस्था का विरोध कर रहे हैं.

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रांची. राजधानी रांची के सबसे बड़े डैम कांके डैम (Kanke Dam) को बचाने को लेकर पिछले 15 दिनों से विस्थापितों का सत्याग्रह चल रहा है. करीब ढाई सौ की संख्या में ग्रामीण (Villagers) तंबू गाड़ कर रात दिन आंदोलन में जुटे हैं. ये लोग विस्थापित मछुआरे हैं, जो डैम को प्रदूषण मुक्त बनाने और वर्तमान में मछली मारने को लेकर की गई टेंडर व्यवस्था का विरोध कर रहे हैं.

दरअसल डैम निर्माण को लेकर दशकों पूर्व बड़ी संख्या में स्थानीय ग्रामीण विस्थापित हुए थे. आज डैम किनारे बसे कई गांवों के विस्थापित अपनी रोजी-रोटी चलाने को लेकर सरकार से मछली मारने का अपना सालों पुराना हक और अधिकार मांग रहे हैं. लेकिन राजस्व को लेकर राज्य सरकार ने टेंडर सिस्टम बहाल किया है. जो इन मछुआरों को स्वीकार नहीं है.

आंदोलनकारियों की ये है दलील



कांके डैम बचाओ संघर्ष समिति के अध्यक्ष महेश मुंडा बताते हैं कि उनके पुरखों ने डैम को लेकर अपनी जमीन दे दी. लेकिन शहर की एक बड़ी आबादी का गंदा सीवरेज पानी इसी डैम में आता है. लिहाजा डैम पूरी तरह प्रदूषित हो चुका है. साथ ही जल कुंभियों का भी अंबार लगा है. ऐसे में डैम को ही अपनी जिंदगी मानने वाले परिवारों के सामने भूखे मरने की नौबत आ चुकी है.
स्थानीय ग्रामीण रेनू मुंडा की माने तो अब मछली पालन से कोई आमदनी नहीं होती. जो कुछ पैसे मिलते हैं उससे भी घर बार नहीं चलता. ऊपर से टेंडर लेने वाले ठेकेदारों की धमकी अलग से सुननी पड़ती है. ठेकेदार मछली मारने के बदले जितने पैसे मांगते हैं, उतना देना उनके बस की बात नहीं.

ग्रामीण सोहन एक्का बताते हैं कि राज्य सरकार ने विस्थापितों को उनका हक देने का वादा किया था. लेकिन अब मुख्यमंत्री तक उनकी आवाज नहीं पहुंच पा रही. ऐसे में सत्याग्रह के अलावा उनके पास कोई चारा नहीं बचा.
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