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झारखंड में 4 साल बाद फुटबॉल मैदानों पर लौटी रौनक, खिलाड़ियों में जगी नई उम्मीदें

झारखंड में 4 साल बाद फुटबॉल से ब्रेक हटा है.

झारखंड में 4 साल बाद फुटबॉल से ब्रेक हटा है.

Football in Jharkhand: राजधानी रांची समेत राज्य में उदास फुटबॉल एक बार फिर दौड़ता भागता नजर आ रहा है. वजह है नवंबर-दिसंबर में संतोष ट्रॉफी के आयोजन की सुगबुगाहट.

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रांची. झारखंड में सालों बाद एक बार फिर से फुटबॉल (Football) गतिमान नजर आ रहा है. दो साल कोरोना की भेंट चढ़ गये, तो दो साल फुटबॉल एसोसिएशन की उदासीनता के नाम. राज्य में करीब चार सालों से रुका और ठहरा फुटबॉल संतोष ट्रॉफी की सुगबुगाहट से मैदानों में दौड़ता नजर आ रहा है. ऐसे में सुविधा और संसाधन की कमी का सामना कर रहे खिलाड़ियों को अपने करियर को लेकर एक नयी उम्मीद जगी है.

राजधानी रांची समेत राज्य में उदास फुटबॉल एक बार फिर दौड़ता भागता नजर आ रहा है. वजह है नवंबर-दिसंबर में संतोष ट्रॉफी के आयोजन की सुगबुगाहट. करीब चार सालों से पूरी तरह राज्यस्तर की लीग और टूर्नामेंट के नहीं हो पाने का खामियाजा खिलाड़ियों को भुगतना पड़ा है. करीब चार सालों से ऑफिसियल फुटबॉल से दूर रहने की वजह से कई खिलाड़ियों को अपने करियर की चिंता सताने लगी है. अपनी बढ़ती उम्र और करियर के दोराहे की वजह के लिए फुटबॉलर सीधे एसोसिएशन को जिम्मेदार ठहराते हैं. खिलाड़ियों की माने तो आर्थिक रूप से कमजोर होने के कारण उनके सामने अक्सर किट और दूसरी सुविधाओं की कमी का सामना करना पड़ता है.

रांची के कांके के सुदूरवर्ती गांव से आने वाले 23 साल के राकेश नायक हटिया फुटबॉल मैदान में लगातार प्रैक्टिस कर पसीना बहा रहे हैं. हताश और परेशान राकेश बताते हैं कि सुविधाओं की कमी से लड़कर राज्य के खिलाड़ी फुटबॉल खेलते हैं. लेकिन टूर्नामेंट नहीं होने से करियर खत्म होने के कगार पर है. राकेश की तरह गुड्डू नायक भी ऐसी ही परेशानी का सामना कर रहे हैं.

दरअसल प्रदेश में फुटबॉल का प्राथमिक स्वरूप क्लब के रूप में है. राज्य में सबसे पहले अंडर 14, 16, 21 और फिर जूनियर नेशनल के तहत खिलाड़ी खुद को तैयार करते हैं. और फिर छोटानागपुर एथलेटिक्स एसोसिएशन से मान्यता प्राप्त क्लब से जुड़कर वहां अच्छा प्रदर्शन कर डिस्ट्रिक्ट लेवल पर खेलने का प्रयास करते हैं. पहली सीढ़ी पार करने के बाद प्रदर्शन और किस्मत अच्छी रही तो फिर उन्हें राज्य टीम में खेलने का मौका मिलता है. जहां से उनके संतोष ट्रॉफी में खेलने का सपना पूरा होता है.

ग्रामीण इलाकों से आने वाले ज्यादतर खिलाड़ी गरीब परिवारों से आते हैं. उनके सामने नौकरी और अपने खेल को जारी रखने के लिए किसी स्पॉन्सर की जरूरत पड़ती है. जो वर्तमान हालत में बिलकुल भी मुमकिन नहीं हो पा रहा.

रांची के हटिया बॉयज क्लब के कोच राजकुमार सेनापति बताते हैं कि खिलाड़ी लीग और टूर्नामेंट का आयोजन नहीं होने से बेहद परेशान है. क्योंकि वे जबतक ऑफिसियल टूर्नामेंट नहीं खेलेंगे. वे आगे नहीं बढ़ सकते. छोटी उम्र से ही पूरी जिंदगी फुटबॉल में झोंक देने वाले खिलाड़ियों की परेशानी से कोच भी इत्तेफाक रखते हैं. कोच की माने तो राज्य में फुटबॉल को लेकर प्रतिभा की कोई कमी नहीं है. लेकिन एसोसिएशन की गंभीरता का हाल भी किसी से छिपा नहीं है. लिहाजा हॉकी और तीरंदाजी की तरह राज्य में अगर फुटबॉल का नाम भी ऊंचा करना है. तो इसके लिए कोशिश ईमानदारी से करनी होगी.

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