रांची: पशुओं को इलाज मिला नहीं, 3 साल में खुद बीमार हो गया 70 लाख का चलंत पशु अस्पताल

मोबाइल क्लीनिकल वैन को 70 लाख और एनिमल लिफ्टर वैन को 25 लाख में खरीदा गया था.

मोबाइल क्लीनिकल वैन को 70 लाख और एनिमल लिफ्टर वैन को 25 लाख में खरीदा गया था.

रांची वेटरनरी कॉलेज (Ranchi Veterinary College) के डीन डॉ. सुशील प्रसाद की माने तो कोरोना संक्रमण की वजह से दोनों वाहनों का मूवमेंट ज्यादा नहीं हो पाया. उन्होंने कहा कि जरूरत पड़ने पर एनिमल लिफ्टर वाहन को जरूर भेजा जाता है.

  • Share this:

रांची. राजधानी रांची के ग्रामीण इलाकों में बीमार पशुओं को इलाज की सुविधा देने के लिए रांची वेटनरी कॉलेज (Ranchi Veterinary College) में करीब एक करोड़ की कीमत पर दो वाहन खरीदे गए थे. लेकिन तीन साल पहले खरीदे गए इन दोनों वाहनों का पशुपालकों को कोई लाभ नहीं मिल पा रहा.

रांची वेटरनरी कॉलेज की गिनती कभी देश के टॉप-5 वेटरनरी कॉलेजों में होती थी. लेकिन सिस्टम में लगा संक्रमण इस कॉलेज की गौरवगाथा को दिनोंदिन धूमिल कर रहा है. वेटनरी कॉलेज के छात्रों के अध्ययन और ग्रामीण इलाकों में पशुओं के इलाज के मकसद से करीब एक करोड़ की लागत से मोबाइल क्लीनिकल वैन और एनिमल लिफ्टर वैन खरीदे गए थे. इसमें 2019 में करीब 70 लाख की लागत से मोबाइल क्लीनिकल वैन की खरीद हुई थी. ताकि वेटनरी कॉलेज के छात्रों को ग्रामीण इलाकों में इंटर्नशिप के लिए ले जाकर वहां पशुओं के इलाज से संबंधित जानकारी दी जा सके. साथ ही सुदूर इलाकों के बीमार पशुओं को इस चलते फिरते पशु अस्पताल का लाभ मिल सके. लेकिन मैन पावर की कमी और दूसरे कारणों से इन दोनों वाहनों का मुकम्मल इस्तेमाल नहीं हो पा रहा. नतीजा एक या दो बार चलने के बाद दोनों वाहन गराज में खड़े-खड़े खराब हो रहे हैं.

दरअसल ग्रामीण इलाकों से बीमार पड़े पशुओं को लिफ्ट कराकर रांची वेटनरी कॉलेज लाने के लिए एनिमल लिफ्ट वैन की खरीद 2019 में हुई थी. करीब 25 लाख की लागत से इसे खरीदा गया था. यह वाहन पिछले 2 सालों में महज चंद किलोमीटर ही अपनी उपयोगिता साबित कर पाया है.

रांची वेटरनरी कॉलेज के डीन डॉ. सुशील प्रसाद की माने तो कोरोना संक्रमण की वजह से दोनों वाहनों का मूवमेंट ज्यादा नहीं हो पाया. उन्होंने कहा कि जरूरत पड़ने पर एनिमल लिफ्टर वाहन को जरूर भेजा जाता है. लेकिन वाहन के लॉग सीट से साफ पता चलता है कि दोनों वाहन का इस्तेमाल ना के बराबर होता है.
कॉलेज के प्रोफेसर डॉ. आलोक स्वीकार करते हैं कि ग्रामीण इलाकों के पशुपालकों को दोनों वाहनों की जानकारी नहीं है. लिहाजा जरूरत पड़ने पर भी पशुपालक वेटरनरी कॉलेज के डॉक्टरों से संपर्क नहीं कर पाते. ऐसे में जरूरी है कि इन दोनों वाहनों की जानकारी ग्रामीण इलाकों के पशुपालकों को दी जाए.

70 लाख में खरीदे गये मोबाइल क्लिनिकल वाहन की स्थिति दिनोंदिन खराब होती जा रही है. चलता फिरता यह पशु अस्पताल अगर गतिमान होता तो राजधानी के ग्रामीण इलाकों में बीमार पशुओं की सेहत सुधर गई होती. न्यूज़- 18 ने जब वेटरनरी कॉलेज के डीन और दूसरे प्रोफ़ेसर से बात की, तो उन्होंने भी कर्मचारियों की कमी की बात को खुलेआम स्वीकार किया. और करोड़ों के इन दोनों वाहनों के इस्तेमाल में तकनीकी दिक्कतों को साझा किया.

अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज