जंगल से लाकर गांव में बसाया और भूल गई सरकार, पढ़ें 17 बिरहोर परिवारों का दर्द

झारखंड के विभिन्न जिलों से लाकर 17 बिरहोर परिवारों को रांची में बसाया गया.

झारखंड के विभिन्न जिलों से लाकर 17 बिरहोर परिवारों को रांची में बसाया गया.

Birhor Tribe: बिरहोर, मुंडा भाषा के दो शब्द बिर मतलब जंगल और होर मतलब आदमी यानी जंगल का आदमी, से बना है. बिरहोर का नाम जुबां पर आते ही समय के साथ तेजी से विलुप्त होते जनजाति की तस्वीर सामने आ जाती है.

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रांची. झारखंड में आदिम जनजाति बिरोहर (Birhor Tribe) का इतिहास बहुत पुराना है. बिरोहर को लेकर कई तरह की मान्यताएं भी हैं, जिस पर शायद आज के लोगों को यकीन ना हो. हमेशा से जंगल में रहने वाले बिरहोर बंदर का शिकार करने को लेकर इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं. कहा जाता है कि जिस पेड़ को बिरहोर छू दे, उस पर बंदर आना छोड़ देते हैं. झारखंड के ऐसे ही बिरहोरों के 17 परिवार को जंगल से दूर रांची के अंगड़ा में बसाया गया है. सरकार की इस पहल के बाद बिरहोर परिवारों की जिंदगी में क्या कोई बदलाव आया?

बिरहोर, मुंडा भाषा के दो शब्द बिर मतलब जंगल और होर मतलब आदमी यानी जंगल का आदमी, से बना है. बिरहोर का नाम जुबां पर आते ही समय के साथ तेजी से विलुप्त होते आदिम जनजाति की तस्वीर सामने आ जाती है. हमेशा से घने जंगलों के बीच रहने वाले इस आदिम जनजाति समुदाय ने जंगली जानवरों का शिकार कर अपना जीवनयापन किया. यही वजह है कि इस घुमक्कड़ प्रवृति के समुदाय को लेकर कई तरह की मान्यताएं प्रचलित हैं.

कुछ साल पहले तक जंगल में अपना जीवन बिताने वालों को आज भी सब कुछ याद है. वो भले ही जंगल से गांव तक पहुंच गए हैं, पर आज भी शिकार करने में वो उतने ही माहिर है. सरकार ने 17 बिरहोर परिवारों को रांची के अनगड़ा में बसाया गया है. साल 2009 में झारखंड के अलग- अलग जिलों से उन्हें यहां लाकर बसाया गया. रहने के नाम पर जर्जर घर, खाने के नाम पर 35 किलो चावल, रोजगार के नाम पर आश्वासन से ज्यादा फिलहाल इन्हें कुछ नहीं मिल रहा.

समय के साथ इन 17 परिवारों में सदस्यों की संख्या बढ़ती ही जा रही है. सरकार ने बिरहोर परिवार के लिए परिवार नियोजन का कार्यक्रम बंद रखा है, ताकि विलुप्त होते बिरहोर की जनसंख्या में इजाफा हो सके. पर 35 किलो चावल से एक महीने तक 10 से अधिक सदस्यों वाले परिवार का पेट कैसे भरेगा, इस पर भी सरकार को सोचना चाहिए.
बिरहोर के बच्चे से बात करेंगे तो पता चलेगा कि इनके शरीर पर ना ठीक से कपड़े होते हैं और ना ही मन में कोई बड़ी ख्वाहिश. हां ये बात जरूर है कि जो अब तक पढ़- लिख ना सके, वो दूसरों के पढ़- लिख जाने की तमन्ना रखते हैं. कुछ बच्चों ने पढ़ाई शुरू भी कर दी है और आगे चलकर वो भी कुछ बन जाना चाहते हैं.

इन बिरहोरों के पास रोजगार के नाम पर बस दो ही विकल्प सामने हैं. पहला तो ये कि वो जंगलों में पंक्षियों को अपनी जाल में फंसा शहर में उसका सौदा कर दो पैसे कमा लें. दूसरा शहर में दैनिक मजदूरी कर अपना और अपने परिवार का पेट भरे. इनके लिए अपनी संस्कृति अब यादों में सिमट कर रह गई है.
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