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OPINION: झारखंड की मूल भावनाओं को नजरअंदाज करना भाजपा को पड़ा भारी
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News18 Jharkhand
Updated: December 24, 2019, 3:54 PM IST
OPINION: झारखंड की मूल भावनाओं को नजरअंदाज करना भाजपा को पड़ा भारी
गैर आदिवासी तबके से रघुवर दास को पांच साल पहले मुख्यमंत्री बनाकर भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने ओबीसी समाज को साधने की जो कोशिश की, उसने आदिवासियों का भाजपा के प्रति भरोसा हिला दिया.

झारखंड मुक्ति मोर्चा (Jharkhand Mukti Morcha), कांग्रेस एवं राष्ट्रीय जनता दल के गठबंधन ने भारतीय जनता पार्टी (Bhartiya Janta Party) को न केवल सत्ता से बेदखल किया बल्कि बुरी तरह से हराया. चुनाव नतीजों का विश्लेषण बताता है कि इस जनजातीय बहुल राज्य में आदिवासी अस्मिता की परवाह न करना भाजपा को बेहद भारी पड़ा.

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रांची. झारखंड के अलग राज्य बनने के दो दशक में राज्य की जनता ने ऐसा स्पष्ट और बड़ा जनादेश (Mandate) कभी नहीं दिया. झारखंड मुक्ति मोर्चा (Jharkhand Mukti Morcha), कांग्रेस एवं राष्ट्रीय जनता दल के गठबंधन ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) को न केवल सत्ता से बेदखल किया बल्कि बुरी तरह से हराया. चुनाव नतीजों का विश्लेषण बताता है कि इस जनजातीय बहुल राज्य में आदिवासी अस्मिता की परवाह न करना भाजपा को बेहद भारी पड़ा. पार्टी का नेतृत्व और संगठन यह समझ ही नहीं पाया कि आदिवासियों ने भाजपा को हराने का मन बना लिया है. करीब छह माह पहले झारखंड में लोकसभा की 14 में से 12 सीटों की जीत से उत्साहित भाजपा ने उन नतीजों में छिपे उसे तथ्य को नजरअंदाज कर दिया कि सीटें वह भले जीत गई लेकिन आदिवासी इलाकों में उनकाे कम वोट मिले.

आदिवासियों ने बीजेपी को दिकू मानकर किया सत्ता से बेदखल

आदिवासी समाज के सबसे बड़े नायक बिरसा मुंडा ने अंग्रेजों के खिलाफ जनजातीय विद्रोह में जंगलों में बाहर से आए लोगों को ‘दिकू’ यानी बाहरी कहा था. झारखंड में 2019 के विधानसभा चुनाव में आदिवासी समाज ने भाजपा को दिकू मानकर वोट किया और इस हश्र के लिए खुद भाजपा ही जिम्मेदार है. गैर आदिवासी तबके से रघुवर दास को पांच साल पहले मुख्यमंत्री बनाकर भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने ओबीसी समाज को साधने की जो कोशिश की, उसने आदिवासियों का भाजपा के प्रति भरोसा हिला दिया. बात वहीं तक सीमित रहती तो शायद फिर भी बचत थी, लेकिन बीते पांच साल में झारखंड की भाजपा सरकार ने तमाम ऐसे फैसले लिए जिससे आदिवासियों में यह सोच घर करती चली गई कि भगवा पार्टी उन्हें उनके जल-जंगल-जमीन से बेदखल कर देगी.

बीजेपी सरकार के इन फैसलों को पड़ा नकारात्मक असर

मसलन आदिवासी समाज में स्वत:स्फूर्त तरीके से शुरू हुए पत्थलगड़ी आंदोलन का भयंकर दमन, छोटानागपुर व संथाल परगना टेनेंसी एक्ट में संशोधन की पहल, विवादित डोमिसाइल यानी स्थानीय नीति, भूमि अधिग्रहण बिल आदि. भाजपा सरकार के इन सभी कदमों को आदिवासी समाज ने जल-जंगल-जमीन पर हमला और वनाधिकार खत्म करने की कोशिश और आदिवासी अस्मिता पर हमला माना. आदिवासियों के बीच इन फैसलों का उसका बेहद नकारात्मक संदेश गया.

अनुसूचित जनजाति के लिए सुरक्षित 28 में से सिर्फ 2 सीटें ही जीती बीजेपी

नतीजतन चुनावों में इस समाज की भाजपा के खिलाफ ऐसी गोलबंदी हुई कि पार्टी का आदिवासी बहुल इलाकों से पत्ता साफ हो गया. अनुसूचित जनजाति के लिए सुरक्षित 28 में से सिर्फ 2 सीटें ही भाजपा जीत पाई. चूंकि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व भी बीते पांच साल में रघुबर दास को विकास पुरुष बताते हुए उनकी तारीफें करता रहा. लिहाजा झारखंड की आदिवासी जनता के मन में यह बात घर करती चली गई कि भाजपा मूलत: आदिवासी हितों के खिलाफ है.हेमंत को जनता ने अपना नेचुरल नेता माना

भाजपा नेतृत्व इससे बेखबर रहा कि रघुबर को उसका साथ, झारखंड की बड़ी आबादी को रास नहीं आ रहा है. यही वजह रही कि झारखंड में तमाम कोशिशों के बावजूद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी झारखंडी जनता को भरोसा नहीं दिला पाए. झारखंडियों ने आदिवासी समाज के युवा चेहरे हेमंत सोरेन को अपना स्वाभाविक नेता और झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेतृत्व में बने विपक्षी दलों के गठबंधन को अपनी पहली पसंद माना. झारखंड के समाज और सियासत पर पैनी नजर रखनेवाले रांची के वरिष्ठ समाज शास्त्री व राजनीतिक विश्लेषक फैसल अनुराग कहते हैं, 'भाजपा जमीनी हकीकत को समझ ही नहीं पाई. उसके सांप्रदायिक एजेंडे पर जल, जंगल, जमीन से जुड़े मुद्दे हावी रहे, क्योंकि आदिवासियों के लिए ये भावनात्मक मुद्दे हैं. आदिवासी समाज ने खुद के हित से जुड़े बुनियादी सवालों पर मतदान किया.'

ईसाई और गैर ईसाई बंटवारे का भी लाभ बीजेपी को नहीं मिला

भाजपा यदि जमीनी मुद्दों के प्रति गफलत में रही तो वहीं झामुमो-कांग्रेस-राजद गठबंधन ने जमीन पर उतरकर अपनी बात लोगों तक पहुंचाई. रघुवर सरकार के फैसलों को हमेशा सवालों के घेरे में रखते हुए झारखंडी अस्मिता की बात की. भाजपा राज में धर्मांतरण कानून, मॉब लींचिंग आदि से आदिवासियों में ईसाई व गैर-ईसाई बंटवारे का लाभ पाने की भाजपा की कोशिश भी नाकाम रही. विपक्षी गठबंधन के नेता बुनियादी मुद्दों पर कायम रहे. रांची विश्वविद्यालय के सामाजिक विज्ञान विभाग के पूर्व संकाय अध्यक्ष डॉ. करमा उरांव चुनाव नतीजों पर अपनी प्रतिक्रिया में कहते हैं— 'भाजपा सरकार की नीतियों से आदिवासी समाज को यह लगने लगा कि उसे हाशिए पर पहुंचाकर उसकी पहचान खत्म करने की साजिश हो रही है. जिन्होंने विरोध किया उनपर रघुवर सरकार ने देशद्रोह तक के मुकदमे लाद दिए. ऐसी सूरत में आदिवासी समाज अपनी अस्मिता बचाने के लिए भाजपा के खिलाफ एकजुट हो गया. चुनाव नतीजे उसी की बानगी हैं.'

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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First published: December 24, 2019, 2:48 PM IST
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