कोरोना के कोप में सरहुल की भव्यता सिमटी, सीएम की सुरक्षित पर्व मनाने की अपील

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने सुरक्षित सरहुल मनाने की लोगों से अपील की है. (फाइल फोटो)
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने सुरक्षित सरहुल मनाने की लोगों से अपील की है. (फाइल फोटो)

सरहुल (Sarhul) चैत्र शुक्ल पक्ष में तृतीया को मनाया जाता है. संथाल और हो आदिवासी (Tribal) इसे बाहा कहते हैं. मुंडा इसे बा पोरोब कहते हैं. संथाल, मुंडा, हो के अनुसार यह फूलों का त्योहार है. खड़िया इसे जंकोर कहते हैं अर्थात अंकुरण का त्योहार.

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रांची. आज आदिवासियों (Tribal) का पर्व सरहुल (Sarhul) है. प्रकृति के इस पर्व को झारखंड में धूमधाम से मनाया जाता है. लेकिन इस बार कोरोना (Corona) के प्रकोप के चलते ऐसा कुछ नहीं हो रहा. इस मौके पर निकाली जाने वाली भव्य शोभायात्राएं स्थगित कर दी गई हैं. आदिवासी पर्व मना रहे हैं, लेकिन कोरोना से बचाव के सारे निर्देशों को ध्यान में रखकर. मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन (Hemant Soren) ने राज्यवासियों को सरहुल की शुभकामनाएं देते हुए लोगों से घरों में सुरक्षित रहने की अपील की है.

सीएम हेमंत का ट्वीट


51 साल में पहली बार नहीं निकली शोभायात्रा 



सरहुल के मौके पर रांची के मेनरोड में निकाली जाने वाली भव्य शोभायात्रा इस बार कोरोना के प्रभाव के चलते नहीं निकाली जा सकी. साल 1969 से मेनरोड में शोभायात्रा निकाली जाती रही है. लेकिन पिछले 51 साल में ऐसा पहली बार हुआ है कि इस बार यह यात्रा नहीं निकाली गई है. कोरोना के खतरे को देखते हुए मुख्य पाहन जगलाल पाहन ने अपील की कि सभी अपने-अपने गांव के सरनास्थल में पाहन के द्वारा समय के अनुसार विधि-विधान के साथ पूजा अनुष्ठान संपन्न कर गांव से अखड़ा तक शोभायात्रा आयोजन कर पर्व का उत्सव मनाएं, यही आदिवासी समाज एवं राज्यहित में अच्छा होगा. पाहन की अपील पर विभिन्न सरना समितियों ने रांची में शोभायात्रा नहीं निकालने का निर्णय लिया.

चैत्र शुक्ल पक्ष में तृतीया को मनाया जाता सरहुल 

सरहुल चैत्र शुक्ल पक्ष में तृतीया को मनाया जाता है. संथाल और हो आदिवासी इसे बाहा कहते हैं. मुंडा इसे बा पोरोब कहते हैं. संथाल, मुंडा, हो के अनुसार यह फूलों का त्योहार है. खड़िया इसे जंकोर कहते हैं अर्थात अंकुरण का त्योहार. उरांव इसे खद्दी कहते हैं. खद्द से खद्दी अर्थात शिशु या सृजन का त्योहार. सरहुल में सूर्य और पृथ्वी की शादी रचाई जाती है. शादी के पश्चात ही प्रजनन की कल्पना की गई है. प्रजनन और सृजन ही जीवन को आगे बढ़ाता है. प्रजनन के पश्चात मनुष्य सबसे पहले पेट के लिए संघर्ष करता है, फिर कपड़ा और मकान के लिए, जबकि अन्य जीवधारियों का संघर्ष पेट और प्रजनन तक ही सीमित रहता है.

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