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ट्राइबल फिलॉसफी पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में बोले सीएम हेमंत- आदिवासियों को अपनी पहचान बचाने की जरूरत
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News18 Jharkhand
Updated: January 17, 2020, 3:58 PM IST
ट्राइबल फिलॉसफी पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में बोले सीएम हेमंत- आदिवासियों को अपनी पहचान बचाने की जरूरत
रांची में ट्राइबल फिलॉसफी पर तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित हुआ है.

ट्राइबल फिलोस्फी पर आयोजित इस सम्मेलन में बंग्ला देश, कीनिया, अफ्रीका, नीदरलैंड सहित 12 देशों के इतिहासकार शिरकत कर रहे हैं. सम्मेलन में 12 एकेडमिक सत्र होंगे.

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रांची. ट्राइबल फिलॉसफी (Tribal Philosophy) पर पहली बार अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन (International Conference) आयोजित करने का गौरव राजधानी रांची को प्राप्त हुआ. तीन दिवसीय इस सम्मेलन का शुक्रवार को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन (CM Hemant Soren) और राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू (Draupadi Murmu) ने शुभारंभ किया. डॉ रामदयाल मुंडा ट्राइबल वेलफेयर रिसर्च इंस्टीच्यूट और कल्याण विभाग द्वारा आयोजित इस सम्मेलन में आदिवासी संस्कृति, सभ्यता और परंपरा पर चिंतन होगा.

आड्रे हाउस सभागार में आयोजित इस सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने आदिवासी के अस्तित्व को लेकर चिंता जताई. उन्होंने कहा कि विकास की अंधी दौड़ में आदिवासी समुदाय अपनी पहचान खोता जा रहा है, जिसे बचाने की जरुरत है. वहीं राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू ने आदिवासी समाज की जीवन शैली, प्रकृति प्रेम, साहित्य और संस्कृति के बारे में दुनिया को बताने की आवश्यकता जताई.

12 देशों के इतिहासकार ले रहे हिस्सा

ट्राइबल फिलोस्फी पर आयोजित इस सम्मेलन में बंग्ला देश, कीनिया,अफ्रीका, नीदरलैंड सहित 12 देशों के इतिहासकार शिरकत कर रहे हैं. सम्मेलन में 12 एकेडमिक सत्र होंगे. इस दौरान आदिवासी समुदाय के रहन-सहन, खान-पान, दिनचर्या और कला-संस्कृति जैसे विषयों पर चर्चा होगी.

नीदरलैंड से इस सम्मेलन में शिरकत करने पहुंचे इतिहासकार पॉल स्ट्रूमर की मानें तो झारखंड ने आदि दर्शन पर सम्मेलन आयोजित कर एक रिकार्ड बनाया है. वहीं दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रो. सुभद्रा चावला ने झारखंड की सराहना करते हुए उम्मीद जतायी कि यह सम्मेलन दुनिया को खास मैसेज देगा.

90 देशों में करीब 37 करोड़ आदिवासी रहते हैं

एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के 90 देशों में करीब 37 करोड़ आदिवासी रहते हैं. जो पूरी दुनिया की आबादी का पांच फीसदी है. आदिवासियों की आर्थिक स्थिति पर नजर दौड़ाएं तो दुनिया के गरीबों में 15 फीसदी भागीदारी आदिवासियों की है. आज भी आदिवासी समुदाय का मुख्य आधार जल, जंगल और जमीन है. प्रकृति से प्रेम इनकी जीवनशैली में समाहित है. चाहे सरहुल हो या कर्मा आदिवासी इन पर्वों के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण का संदेश देते हैं.रिपोर्ट- भुवन किशोर झा

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First published: January 17, 2020, 3:57 PM IST
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