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पुण्यतिथि विशेष: 'निधन के 28 बरस बाद भी बासी नहीं पड़ी हैं शैलप्रिया की कविताएं'

Hindi literature: शैलप्रिया की सैकड़ों रचनाएं हैं. उन्होंने नारी उत्पीड़न के खिलाफ और नागरिक अधिकारों के लिए लगभग 3 दशक ...अधिक पढ़ें

रिपोर्ट : शिखा श्रेया

रांची. झारखंड की लब्धप्रतिष्ठ कवयित्री शैलप्रिया ने अपने जीवन के महज 48 वसंत देखे थे कि 1 दिसंबर 1994 को नियति के कठोर हाथों ने उन्हें दबोच लिया और साथ ले गई. शैलप्रिया स्त्री अधिकारों को लेकर हमेशा सचेत रही थीं, यही वजह है कि उनकी एक पहचान सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में भी रही. लेकिन झारखंड में उनकी मूल पहचान कवयित्री के तौर पर भी रही. उनके निधन के 28 बरस बाद भी उनका नाम झारखंड के युवा रचनाकारों के बीच सम्मान के साथ लिया जाता है. इनके नाम पर हर दो वर्ष पर हिंदी की किसी कवयित्री को दिया जाने वाला ‘शैलप्रिया स्मृति सम्मान’ झारखंड के महत्त्वपूर्ण सम्मानों में से एक है.

शैलप्रिया की सैकड़ों रचनाएं हैं. उन्होंने नारी उत्पीड़न के खिलाफ और नागरिक अधिकारों के लिए लगभग 3 दशकों तक संघर्ष किया. कई संस्थाओं में उनकी सक्रिय भागीदारी रही. उनकी रचना ‘कविता किसी सहेली की शॉल नहीं दोस्तो…’ आज तक लोगों के जेहन में रची-बसी है. समय-समय पर रांची की कई महिला रचनाकारों ने स्वीकारा है कि शैलप्रिया की कविताएं स्त्री मन के गहरे परतों की कविताएं हैं. यही वजह है कि हर महिला शैलप्रिया की कविता से खुद को जुड़ा हुआ पाती है.

लोगों के दिल में उतरती हैं उनकी कविताएं

रांची के साहित्यकार नीरज नीर ने शैलप्रिया को याद करते हुए कहा कि शैलप्रिया के निधन के 28 बरस बाद भी उनकी कविताओं में अजब सी ताजगी है, कहीं कोई बासीपन नहीं. उन्होंने अपनी रचनाओं में भविष्य का चेहरा भी देखा था. इनकी रचना बेहद सहज और सरल भाषा में होती थीं. यही वजह है कि उनकी कविताएं पढ़नेवाले के दिल में आसानी से उतर जाया करती हैं. लोग उनकी हर कविता के साथ खुद को जुड़ा हुआ महसूस करते है. साथ ही उनकी कविता में जमीनी हकीकत और महिलाओं के हालात बड़े मार्मिक तरीके से उभरे हैं, जो सीधे दिल को छू जाते हैं.

सामाजिक-सांस्कृतिक प्रश्नों पर निरंतर क्रियाशील

शैलप्रिया के बारे में कवयित्री कलावंती सिंह सुमन कहती हैं कि उन्होंने अपनी कविता के माध्यम से समाज में हो रहे नारी उत्पीड़न के खिलाफ और नागरिक अधिकारों के लिए लंबे समय तक संघर्ष किया. सुरभि, अभिव्यक्ति, जागरण, नारी उत्पीड़न विरोधी संघर्ष समिति और महिला मोर्चा के बैनर तले सामाजिक सांस्कृतिक प्रश्नों पर हमेशा सक्रिय रहीं. कई संस्थानों की संस्थापक सदस्य भी रही है. अपनी कविताओं के माध्यम से उन्होंने पीड़ित महिलाओं की दबी हुई आवाज को समाज में स्वार देने का काम किया है. साहित्यकार कलावती सिंह कहती हैं कि मुझे उनकी रचना ‘सहेली’ आज भी याद है. इतने सरल शब्दों में, इतनी सरल भाषा में बड़ी जटिल बात आसानी से समझा जाती है. समाज के मार्मिक मुद्दों पर बेबाकी से उन्होंने अपनी राय रखी और कविता के माध्यम से इस तरह परोसा कि उन्हें कोई भी पढ़े तो वह उससे जुड़ा हुआ महसूस करेगा. यही इनकी कविता की सबसे बड़ी खासियत है.

Tags: Hindi Literature, Jharkhand news, Ranchi news

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