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देवी मां के इस मंदिर में 200 साल से पूजा-अर्चना में शामिल हो रहे मुस्लिम परिवार

रांची के बड़कागढ़ स्टेट में साल 1880 से मां चिंतामणि की आराधना में मुस्लिम परिवार के लोग हिस्सा लेते आ रहे हैं.

रांची के बड़कागढ़ स्टेट में साल 1880 से मां चिंतामणि की आराधना में मुस्लिम परिवार के लोग हिस्सा लेते आ रहे हैं.

दशहरा 2021: साल 1880 में जब मां चिंतामणि की पूजा अर्चना शुरू हुई तब समाज के हर वर्ग को अलग- अलग जिम्मेदारी दी गई. तभी से मुस्लिम परिवार के लोगों के द्वारा नवरात्र पर देवी मंदिर तक सड़क की साफ- सफाई की जाती है.

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रांची. नवरात्र (Navratra) में मां दुर्गा के अलग- अलग रूपों की पूजा में सामाजिक सौहार्द का राज भी छुपा होता है. रांची के बड़कागढ़ स्टेट का इतिहास इस बात का गवाह है कि मां दुर्गा की पूजा अर्चना में समाज के हर वर्ग के साथ- साथ मुस्लिम परिवार की कितनी बड़ी भूमिका है. सप्तमी से लेकर नवमी के दिन बलि प्रथा तक की पूजा पद्धति बगैर मुस्लिम परिवार के सहयोग से संपंन नहीं होती.

रांची के बड़कागढ़ स्टेट का प्राचीन देवी घर. देवी के इस प्रांगण में सामाजिक सौहार्द का सालों पुराना इतिहास का राज छुपा है. नया सराय के मुख्तार अंसारी बताते है कि अंग्रजों के खिलाफ साल 1857 में ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव के नेतृत्व में शुरू की गई लड़ाई में शेख भिखारी सेनापति की भूमिका में थे. HEC के निर्माण से पहले रांची के इस इलाके में मुस्लिम परिवार की बड़ी आबादी बसती थी. जब 1880 में मां चिंतामणि की पूजा अर्चना शुरू हुई तब समाज के हर वर्ग को अलग – अलग जिम्मेदारी दी गई. इसी जिम्मेदारी के तहत सप्तमी के दिन जब बड़कागढ़ से डोली पर सवार हो कर नवपत्रिका की शोभा यात्रा निकलती है , तब मुस्लिम परिवार के लोगों के द्वारा ही देवी घर तक सड़क की साफ- सफाई की जाती है. नवमी के दिन यहां 91 मौजा से बलि प्रथा का इतिहास है. जहां मुस्लिम परिवार की तरफ से निशा बलि में भतुआ की परंपरा है.

रांची के बड़कागढ़ स्टेट के इतिहास के पन्नों को पलटे, तो शुरुआत 1691 से होती है. ठाकुर नवीन नाथ सहदेव बताते हैं कि 1691 में ठाकुर ऐनी नाथ शाहदेव बड़कागढ़ स्टेट के प्रथम राजा हुए करते थे. ठाकुर ऐनी नाथ शाहदेव ने सतरंगी गढ़ से माँ चिंतामणि की पूजा अर्चना की शुरुआत की थी. ये परंपरा समय के साथ आगे बढ़ती चली गई. ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया. जब ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव को फांसी दे दी गई, तब उनकी पत्नी ठाकुरानी वानेश्वरी कुंवर ने 1880 में इसी सीमांत पर माँ चिंतामणि की पूजा शुरू की. आज भी नवरात्र में माँ की पूजा अर्चना उसी रीति रिवाज और परंपरा से होती है जो पहले हुआ करती थी.

कहते है माँ की भक्ति में शक्ति का स्वरूप तजर आता है. माँ चिंतामणि की आराधना करने वालों का मानना है कि इस देवी घर में माँ साक्षात विराजमान है. यहां सच्चे मन से माँ की उपासना करने वालों की मनोकामना अवश्य पूरी होती है.

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