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रोजगार मेले की साख पर बट्टा, डिग्री के आधार पर नहीं मिल रही नौकरियां

रांची - रोजगार मेले में डिग्री बेमानी साबित हो रही है.

रांची - रोजगार मेले में डिग्री बेमानी साबित हो रही है.

अपनी डिग्री और अपनी काबिलियत के अनुसार नौकरी तलाश रहे युवाओं को रोजगार मेला का आयोजन खुशी कम, गम ज्यादा देने लगा है. इसकी वजह डिग्री के अनुसार राज्य में रोजगार का नहीं होना है.

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राज्य के विभिन्न जिलों में आयोजित होने वाला श्रम विभाग का रोजगार मेला अपनी साख खोता जा रहा है. दावे अक्सर बड़े - बड़े किये जाते हैं. लेकिन ऐसे रोजगार मेला की हकीकत ये है कि यहां पर ड्रिग्री के आधार पर रोजगार देने वाली कंपनी ही नहीं आती. लिहाजा किसी को सुरक्षा गार्ड तो किसी को लेंथ मशीन के काम का ऑफर दिया जाता है.

अपनी डिग्री और अपनी काबिलियत के अनुसार नौकरी तलाश रहे युवाओं को रोजगार मेला का आयोजन खुशी कम, गम ज्यादा देने लगा है. इसकी वजह डिग्री के अनुसार राज्य में रोजगार का नहीं होना है. हर रोजगार मेले से पहले दावे और वादे बहुत किये जाते हैं. लेकिन रोजगार मेला में आते ही युवाओं को लगता है जैसे हाथ में आयी डिग्री किसी काम की नहीं.

धनबाद की सावित्री और गुमला का पवन कुछ ऐसे ही उदाहरण हैं. सावित्री ने रांची विवि से पोस्ट ग्रेजुएट किया और फिर लाइब्रेरी साइंस की डिग्री भी ली. लेकिन रोजगार मेले जैसे आयोजन उसकी पीड़ा को और ज्यादा बढ़ा देता है. कुछ ऐसा ही हाल गुमला के पवन और रांची के अमित का है. इन सबके पास बी टेक की डिग्री है. लेकिन इन्हें रोजगार मेले में लेंथ मशीन मैन के जॉब का ऑफर दिया गया. साथ ही कुछ लोगों को सिक्युरिटी गार्ड का जॉब ऑफर मिला.

बता दें कि श्रम विभाग के अधिकारियों ने रांची के आईआईटी ग्राउंड में सोमवार को रोजगार मेले का आयोजन किया. 24 से ज्यादा कंपनियों को यहां पर भागीदार बनाया गया था. लेकिन बात यदि जॉब
ऑफर की करें तो अधिकतर कंपनियां पांच से सात हजार वेतन से ज्यादा देने का औकात नहीं रख रही थी. हालांकि कंपनियों के प्रतिनिधियों का कहना था कि आवेदकों को पहले लायक बनाना पड़ेगा. हद तो ये कि श्रम नियोजन एवं प्रशिक्षण विभाग के भी अधिकारी कंपनियों के प्रतिनिधियों के साथ हां में हां मिलाते देखे गये.

सवाल ये नहीं कि रोजगार मेले में डिग्री बेमानी साबित हो रही है. सवाल ये है कि क्या बीटेक और एमटेक कर चुके अभ्यर्थियों के पास राज्य से पलायन ही एक मात्र विकल्प है. अगर नहीं तो श्रम विभाग को इस सवाल का जवाब तलाशना होगा कि बड़े विश्वविद्यालय से बड़ी डिग्रियां लेकर छात्र कहां जायेंगे.

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