झारखंड में लॉकडाउन से बढ़ी ह्यूमन ट्रैफिकिंग की आशंका
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झारखंड में लॉकडाउन से बढ़ी ह्यूमन ट्रैफिकिंग की आशंका
दैनिक मजदूरी करने वाले ये लोग जाहिर तौर पर आर्थिक रूप से कमजोर हैं. (सांकेतिक तस्वीर)

देह-व्यापार में धकेली गईं लड़कियों की हालत अच्छी तो नहीं रहती, यह जाहिर है. पर जो घरेलू सहायिका होती हैं उनमें भी अधिकतर का दैहिक-मानसिक शोषण होता रहता है.

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रांची. वैसे तो अभी विश्व कोरोना (Coronavirus) की मार झेल रहा है. अपने देश में भी कोरोना का प्रकोप जारी है. तो भला झारखंड इससे कैसे अछूता रहता. झारखंड (Jharkhand) में भी कोरोना ने अपने पांव फैलाए. संक्रमण के मामले में झारखंड सरकार ने जो सख्त एहतियात बरते, उसका असर है कि यहां बाकी राज्यों के मुकाबले बेहतर हालात रहे. गौर करें कि राज्य में इस बुधवार तक कुल 2219 लोग कोरोना से संक्रमित हुए हैं. संक्रमित हुए 2219 लोगों में 1841 मरीज वैसे लोग हैं जो अन्य राज्यों से लौटे हैं. मतलब यह कि राज्य में पहले से रह रहे महज 438 लोग इसके शिकार हुए. इलाज के सीमित संसाधनों के बावजूद 1575 मरीज ठीक होकर अपने घरों को लौट चुके हैं. वहीं, 632 लोगों का फिलहाल इलाज चल रहा है, जबकि अभी तक कोरोना वायरस संक्रमण (COVID-19) से 12 लोगों की मौत हुई है.

सच है कि ये आंकड़े आश्वस्त करते हैं कि झारखंड में हेमंत सोरेन (Hemant Soren) की अगुवाई में कोरोना पर शिकंजा कसने में मेडिकल स्टाफ और प्रशासन ने अच्छी भूमिका निभाई है. यह अलग बात है कि बावजूद इसके इस पूरे प्रकरण में आलोचना के कई अवसर आए हैं. लापरवाहियों की कई कहानियां सामने आईं. बीजेपी के कई प्रवक्ताओं ने सोशल साइट्स पर सरकार के खिलाफ गैरजरूरी आलोचना की. इस बीच हमें यह समझने की जरूरत है कि कोरोना ने झारखंड में असल समस्या क्या पैदा की है. यह समस्या बीजेपी की ओर से की जाने वाली गैरजरूरी टिप्पणियां नहीं हैं, या बीजेपी प्रवक्ताओं की ओर से कोरोना से पैदा हालात को राजनीतिक अवसर की तरह देखा जाना भी नहीं है. जो छोटी-मोटी लापरवाहियों के मामले सामने आए हैं, दरअसल वे भी सीमित संसाधनों की वजह से हुए हैं. इसलिए यह भी मूल समस्या नहीं है. असल समस्या पैदा हुई है कोरोना के प्रसार को रोकने के लिए किया गया लॉकडाउन, जो निश्चित रूप से अनिवार्य था. पर इस लॉकडाउन ने झारखंड में एक ऐसी समस्या पैदा की है, जो दूसरे राज्यों में नहीं हो सकती. और फिलहाल उस समस्या की ओर हमसब का ध्यान अभी गया नहीं है.

भुखमरी के शिकार लोगों पर दलालों की नजर



झारखंड खनिज संपदा से भरपूर राज्य है. यहां की धरती के सीने में लौह-अयस्कों का भंडार मौजूद है. बावजूद इस राज्य के अंदरूनी हिस्से में रहने वाले लोग अब भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं. ये लोग या तो खेती-किसानी करते हैं या अपने इलाके से बाहर निकलकर मेहनत-मजदूरी करते हैं. इसी से उनका जीवनयापन होता है. दैनिक मजदूरी करने वाले ये लोग जाहिर तौर पर आर्थिक रूप से कमजोर हैं. लॉकडाउन का सबसे ज्यादा असर इन्हीं लोगों पर पड़ा है. मजदूरी मिलनी बंद हो गई. खाने के लाले पड़े. सरकारी सहयोग जिन्हें मिल गया, उनका तो काम किसी तरह चल गया. पर अधिकतर इलाके इस सहयोग से अछूते रह गए. यहां भी नई सरकार की सीमा आड़े आई. नतीजा है कि भुखमरी के शिकार इन लोगों पर उन दलालों की निगाह टिकी रही, जो ह्यूमन ट्रैफिकिंग (Human Trafficking) में लिप्त हैं.
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पहले भी ये दलाल झारखंड के सिमडेगा, गुमला, डालटेनगंज, लातेहार, मांडर, खूंटी, हजारीबाग सरिखे आर्थिक रूप से कमजोर जिलों की युवतियों को नौकरी के सपने दिखा बड़े शहरों की ओर ले जाते रहे हैं. कुछ लड़कियों को देह-व्यापार में धकेलते रहे हैं और कुछ को घरेलू सहायिका के तौर पर रखवाते हैं. देह-व्यापार में धकेली गईं लड़कियों की हालत अच्छी तो नहीं रहती, यह जाहिर है. पर जो घरेलू सहायिका होती हैं उनमें भी अधिकतर का दैहिक-मानसिक शोषण होता रहता है. यानी हर हालत में उनके हिस्से नारकीय स्थिति ही आती है. पौ-बारह होते हैं दलालों के. इस लॉकडाउन के दौरान झारखंड में ये दलाल सक्रिय हुए हैं. भुखमरी झेल रहे आदिवासियों को आर्थिक मदद पहुंचा रहे हैं. और फिर इस आर्थिक मदद का दबाव बना वे झारखंड की इन मासूम लड़कियों के शोषण का जाल बुन रहे हैं. इस लॉकडाउन के दरम्यान झारखंड से 116 बच्चों के लापता होने की सूचना है, जिनमें 89 बेटियां हैं.

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लॉकडाउन से पैदा हुई समस्या

रांची में जुवेनाइल मामलों को देख रहे मजिस्ट्रेट श्रीकांत स्वीकार करते हैं कि इलाके में सक्रिय दलाल पहले तो गरीब परिवारों को आर्थिक मदद पहुंचाते हैं. उसके बाद वे इस मदद के दबाव में उस परिवार की लड़कियों का शोषण करते हैं और ह्यूमन ट्रैफिकिंग के अपने धंधे को अंजाम देते हैं. वे कहते हैं कि हमने पिछले कई वर्षों में दिल्ली जैसे महानगरों से झारखंड के बच्चे और लड़कियों को बचाया है. उन सब ने अपनी जो कहानियां बताईं, उनका सार-संक्षेप यही ट्रेंड बतलाता है. इस लॉकडाउन से पैदा हुई भुखमरी के बाद इन इलाकों में ह्यूमन ट्रैफिकिंग की आशंका बढ़ गई है. जाहिर तौर पर झारखंड सरकार की निगाह इस भावी समस्या पर होनी चाहिए. उसे इन इलाकों के लिए कोई योजना तैयार कर उसे लागू करना चाहिए ताकि ह्यूमन ट्रैफिकिंग रोकी जा सके.
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