झारखंड: मोदी मैजिक में गायब हुआ महागठबंधन, 2 सीटों पर सिमटने के ये रहे कारण

रांची के वरिष्ठ पत्रकार जीतेन्द्र कुमार कहते हैं कि पूरे देश की तरह झारखंड में भी मोदी फैक्टर जबरदस्त काम किया. लोग यह मान कर चले कि वे पीएम को चुन रहे हैं.

News18 Jharkhand
Updated: May 24, 2019, 4:59 PM IST
झारखंड: मोदी मैजिक में गायब हुआ महागठबंधन, 2 सीटों पर सिमटने के ये रहे कारण
झारखंड: मोदी की आंधी में उड़ा महागठबंधन
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Updated: May 24, 2019, 4:59 PM IST
झारखंड में लोकसभा चुनाव के दंगल में महागठबंधन का कुनबा एनडीए के सामने बुरी तरह धाराशाई हो गया. तमाम सियासी बिसात बिछाने के बावजूद महागठबंधन मात्र दो सीटों पर सिमट गया. सिंहभूम पर कांग्रेस और राजमहल पर जेएमएम को जीत मिली. बाकी 12 सीटें बीजेपी और उसके सहयोगी आजसू के खाते में गई. इस प्रदर्शन के साथ बीजेपी सूबे में 2014 के इतिहास को दोहराने में कामयाब हुई. हालांकि इस बार बीजेपी के सामने 2014 की तुलना में मजबूत और एकजुट विपक्ष था. बावजूद इसके बीजेपी को एक कदम तक पीछे नहीं खिसका पाए. महागठबंधन की इस करारी हार के पीछे कई कारणों को जिम्मेवार माना जा रहा है.

रांची के वरिष्ठ पत्रकार जीतेन्द्र कुमार कहते हैं कि पूरे देश की तरह झारखंड में भी मोदी फैक्टर जबरदस्त काम किया. लोग यह मान कर चले कि वे पीएम को चुन रहे हैं. इसलिए सामने चाहे बीजेपी के प्रत्याशी हों या विपक्ष के, जनता के जेहन में मात्र मोदी का चेहरा रहा. लोगों ने मोदी को ही वोट किया.



जीतेन्द्र कहते हैं कि उज्ज्वला योजना, शौचालय, प्रधानमंत्री आवास योजना, आयुष्मान भारत और डीबीटी के माध्यम से किसानों के खाते में पैसे भेजने जैसी योजनाओं का लाभ भी बीजेपी को मिला. खासकर गरीब, पिछड़े, आदिवासी और कुछ हद तक अल्पसंख्यक तबके ने भी बीजेपी को वोट किया. लोग मोदी को एक और मौका देना चाहते थे. जबकि महागठबंधन में कहीं कोई स्पष्ट चेहरा नहीं था.

सूबे में कांग्रेस के दिग्गज और पूर्व केन्द्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय रांची सीट से चुनाव हार गये हैं. वह विपक्ष की हार के पीछे महागठबंधन में समन्वय की कमी को कारण मानते हैं. सुबोधकांत कहते हैं कि सहमति बनने के बावजूद महागठबंधन का कुनबा धरातल पर उतारने में काफी देरी हो गई. तब तक लोकसभा चुनाव आ गया. विपक्ष के बड़े नेता एकजुट तो हुए, लेकिन जिला और जमीन पर काम करने वाले नेता व कार्यकर्ता एकसाथ नहीं आ पाए. पूर्व केन्द्रीय मंत्री के मुताबिक विपक्ष के लिए मोदी सरकार के विकासकार्यों की आलोचना करना भी घाटे का सौदा साबित हुआ. बीजेपी के अंडरकरंट को विपक्ष नहीं समझ पाया.

झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) के प्रवक्ता विनोद पांडेय भी मोदी फैक्टर की बात स्वीकारते हैं. वह कहते हैं कि यह जीत किसी पार्टी की नहीं, व्यक्ति की हुई है. हमलोग अपनी बात जनता को नहीं समझा सके, जबकि मोदी इसमें सफल रहे. हमारा वोट प्रतिशत बढ़ा, लेकिन रिजल्ट में तब्दील नहीं हुआ. इस चुनाव में लोग देश के पीएम को चुन रहे थे.

प्रदेश बीजेपी प्रवक्ता दीनदयाल वर्णवाल कहते हैं कि जनता ने परिवारवाद और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर महागठबंधन को नकार दिया. जबकि मोदी सरकार की योजनाओं के दम पर पार्टी ग्रामीण इलाकों में भी पैठ बनाने में कामयाब हुई. महागठबंधन में ऊपर से एकजुटता थी, लेकिन अंदरखाने बिखराव था. सेना के शौर्य पर सवाल उठाना भी विपक्ष को महंगा पड़ा.

झारखंड में 6 महीने बाद विधानसभा का भी चुनाव होना है. जाहिर है लोकसभा चुनाव के नतीजे का फायदा बीजेपी और एनडीए को मिलेगा. वहीं विपक्ष में निराशा के साथ-साथ पार्टी में टूट का भी खतरा होगा. आगे अपने कुनबे को सहेज कर रख पाना विपक्षी पार्टियों के लिए आसान नहीं होगा. लोकसभा चुनाव में शिबू सोरेन, बाबूलाल मरांडी, सुबोधकांत सहाय, सुखदेव भगत, चंपई सोरेन, कीर्ति आजाद जैसे दिग्गजों की हार से पैदा हुई हताशा से उभरना महागठबंधन के लिए कठिन है. इस चुनाव में जेएमएम का अभेद संताल किला भी ध्वस्त हो गया. बीजेपी संताल परगना की तीन सीटों में दो पर बाजी मारी. जेएमएम किसी तरह राजमहल सीट को अपने पास रख पाया. वहीं पिछली बार की तरह इस बार भी जेवीएम और आरजेडी का सुपड़ा साफ हो गया. कांग्रेस किसी तरह से एक सीट जीत पाई है.
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रिपोर्ट- नवीन कुमार

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