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दिल्ली में निर्भया के साथ हुई क्रूरता की याद दिला देती है रांची गैंगरेप की वारदात

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Updated: November 29, 2019, 4:49 PM IST
दिल्ली में निर्भया के साथ हुई क्रूरता की याद दिला देती है रांची गैंगरेप की वारदात
कॉलेज की छात्रा से गैंगरेप की वारदात के बाद शहर के लोगों में उबाल दिख रहा है. पुलिस (Police) ने 12 आरोपियों को दबोच लिया है. (प्रतीकात्मक फोटो)

इस वारदात की खबर आने के बाद फिलहाल चौक-चौराहों और मुहल्ले के नुक्कड़ों पर बहस चल रही है. रोष फूट रहा है. रांची के लोगों के ट्विटर (Twitter) हैंडल और फेसबुक (Facebook) पर इस वारदात को लेकर गुस्सा दिखाई दे रहा है. रांची हाईकोर्ट के कुछ वकीलों ने इस वारदात के खिलाफ एकजुट होने पर विचार-विमर्श किया. उनकी राय है कि इस केस के आरोपियों की पैरवी कोई वकील न करे.

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रांची. दिसंबर आते ही इसकी 16 तारीख की काली यादें सिर उठाने लगती हैं. तब दिल्ली की सड़कों पर लोगों में उबाल देखा था. इस बार रांची (Ranchi) में हूं. यहां कॉलेज की छात्रा से गैंगरेप की वारदात के बाद शहर के लोगों में उबाल दिख रहा है. पुलिस (Police) ने 12 आरोपियों को दबोच लिया है. गिरफ्तार किए गए आरोपी रांची के संग्रामपुर गांव के रहने वाले सुनील मुंडा, कुलदीप उरांव, सुनील उरांव, संदीप तिर्की, अजय मुंडा, राजन उरांव, नवीन उरांव, अमन उरांव, बसंत कच्छप, रवि उरांव, रोहित उरांव और ऋषि उरांव हैं.

वारदात मंगलवार रात की है. एसपी (ग्रामीण) ऋषभ कुमार झा के मुताबिक, छात्रा शाम 5:30 बजे अपने सहपाठी के साथ बस स्टॉप पर बैठी थी. तभी बाइक पर आए दो युवकों ने तमंचे के बल पर उससे छेड़छाड़ की. विरोध करने पर उसके सहपाठी से मारपीट की और छात्रा को अगवा कर लिया. अगवा करने के बाद इन दोनों अपराधियों ने अपने कुछ साथियों को बुलाया, इसके बाद वे छात्रा को ईंट भट्ठे पर ले गए और गैंग रेप किया.

रांची के लोगों में रोष
इस वारदात की खबर आने के बाद फिलहाल चौक-चौराहों और मुहल्ले के नुक्कड़ों पर बहस चल रही है. रोष फूट रहा है. रांची के लोगों के ट्विटर हैंडल और फेसबुक पर इस वारदात को लेकर गुस्सा दिखाई दे रहा है. रांची हाईकोर्ट के कुछ वकीलों ने इस वारदात के खिलाफ एकजुट होने पर विचार-विमर्श किया. उनकी राय है कि इस केस के आरोपियों की पैरवी कोई वकील न करे.



फेसबुक पर बालेंदुशेखर मंगलमूर्ति की प्रतिक्रिया है- ‘ओह्ह, कितना गुस्सा दिलाने वाली घटना है. शहर इतना अनसेफ है!!’ संगीता कुमारी लिखती हैं ‘लोगों को तब तक समझ में कोई बात नहीं आती, जब तक कि वो खुद उस स्थिति से नहीं गुजरते’. नवीन शर्मा की प्रतिक्रिया है ‘ये घटनाएं कानून-व्यवस्था पर भी सवाल उठाती हैं. अपराधियों में कानून का भय नहीं है.' रजनीश आनंद की पोस्ट है ‘जो लड़कियां अपने पुरुष साथी के साथ अकेली होती हैं वे हर किसी के लिए सहज उपलब्ध नहीं हो जातीं. यह बात समाज के लोगों को समझनी होगी. एक महिला किसके साथ होगी और किसके साथ नहीं यह तय करने का उसे अधिकार है. लेकिन यह बात लोगों को समझ में नहीं आती.'

पिछले दिनों रांची में दो ऐसी घटनाएं हुईं, जो इस बात को पुख्ता करती हैं. हालिया घटना नेशनल लॉ कॉलेज की है, जहां की एक छात्रा अपने साथी के साथ बस स्टॉप पर बैठी थी और उसके साथ 12 लोगों ने रेप किया, वहीं दूसरा मामला बरियातू इलाके का था. यहां एक लड़की अपने दोस्त के साथ बरियातू पहाड़ की ओर घूमने गई थी और उसके साथ गैंगरेप हुआ. एसपी (ग्रामीण) ने बताया कि 12 आरोपियों में एक सुनील मुंडा कांके एरिया में जमीन का कारोबार करता है. पुलिस ने उसके पास से 9 एमएम की पिस्टल बरामद की है.
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बदली हुई रांची
सोलह साल बाद पिछले तीन महीने से रांची में हूं. पर यह वही रांची नहीं है जो सोलह पहले हुआ करता था. झारखंड के दूसरे जिलों और शहरों में भी बदलाव की बयार है, पर रांची बहुत तेजी से बदला है. महानगरों के शिक्षण संस्थान अब यहां अपनी शाखा खोल चुके हैं. शिक्षा के मामले में पहले भी रांची झारखंड के अन्य शहरों से बेहतर था, पर राजधानी बनने के साथ यह एजुकेशन हब के तौर पर पहचाने जाने लगा. कहा जा सकता है कि अब रांची भी महानगर की खूबियों और खामियों से खुद को नए रूप में गढ़ रहा है. राजधानी रांची की सड़कों पर अब छोटी-बड़ी गाड़ियों का जो रेला दिखता है, वह बताता है कि यहां के लोगों के रहन-सहन में बदलाव आ चुका है. लड़के और लड़कियों का ड्रेस सेंस बदला है. पार्कों और पर्यटन स्थलों पर स्थानीय युवा जोड़ियों की भीड़ बढ़ी है. शादी-ब्याह पर होने वाले खर्च बढ़े हैं. कारोबार की नई संभावनाएं यहां पसरी हैं.

सामाजिक रिश्तों के रेशे कमजोर पड़े
सोलह साल पहले यहां मल्टीप्लैक्स या सोसाइटी कल्चर न के बराबर था. अब हर तरफ ऊंची इमारतें नजर आ रही हैं. यहां साथ रहने और साथ चलने की जो प्रवृति थी, उसमें थोड़ा ठहराव आया है. कारोबारी रिश्ते बढ़े हैं और सामाजिक रिश्तों के रेशे थोड़े कमजोर पड़े हैं. युवाओं के खुलेपन पर यहां के पुराने लोगों की नाक सिकुड़ने लगी है. जमीन के धंधे में पूंजीपतियों का दखल बढ़ा है. दलाल सक्रिय हुए हैं. वारदात बढ़ी हैं.
यहां के आदिवासी और गैरआदिवासी (दोनों) सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर बहुत सक्रिय रहे हैं. वे विचारों के स्तर पर भी बहुत खुले समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं. पर जो नई पौध आई है उनके सामने व्यवसाय और कारोबार की नई चमक है. इस चमक से कई आंखें चुंधिया गई हैं. इन चुंधियाई आंखों में सामाजिक मर्यादाओं का सम्मान हाशिये पर है.

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First published: November 29, 2019, 4:08 PM IST
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