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कभी HEC की बदौलत गुलजार था रांची का ये इंडस्ट्रियल एरिया, इस एक कारण ने 90 फीसदी उद्योगों में लगवा दिये ताले

एक्सपर्ट की मानें तो आज जरूरत इस बात की है कि एचईसी को नये प्रोडक्ट्स बनाने की जिम्मेदारी दी जाए, ताकि इसकी भूमिका का भी विस्तार हो सके.

एक्सपर्ट की मानें तो आज जरूरत इस बात की है कि एचईसी को नये प्रोडक्ट्स बनाने की जिम्मेदारी दी जाए, ताकि इसकी भूमिका का भी विस्तार हो सके.

Ranchi News: रांची के तुपुदाना इंडस्ट्रियल एरिया की पहचान एचईसी एंसीलरी इंडस्ट्री एरिया के तौर पर हुआ करती थी. कभी यहां 100 से ज्यादा कंपनियां मौजूद थीं. लेकिन आज 5 से 7 कंपनियां ही बची हुई हैं.

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रांची. झारखंड की राजधानी रांची में स्थित हेवी इंजीनियरिंग कार्पोरेशन लिमिटेड (HEC) के गौरव की कहानी किसी से छुपी नहीं है. इस मदर इंडस्ट्री ने एक समय कई इंडस्ट्रीज को जन्म देकर उसकी तकदीर लिखी थी. रांची के तुपुदाना इंडस्ट्रियल एरिया (Tupudana Industrial Area) की कहानी भी एचईसी की ही कलम से लिखी गयी थी. लेकिन बदलते वक्त के साथ तुपुदाना इंडस्ट्रियल एरिया की पहचान अब गुम होती नजर आ रही है.

ये कहानी है 1970 के दशक की है, जब रांची के तुपुदाना इंडस्ट्रियल एरिया की पहचान एचईसी एंसीलरी इंडस्ट्री एरिया के तौर पर हुआ करती थी. उस समय यहां मौजूद 100 से ज्यादा कंपनियां एचईसी से मिले वर्क ऑर्डर और काम के भरोसे ही अस्तित्व में आयी थी. लेकिन एचईसी के बदलते हालात के साथ तुपुदाना इंडस्ट्रियल एरिया की स्थिति और पहचान भी बदल गयी. एचईसी के भरोसे रहने वाले तुपुदाना के ज्यादातर फैक्ट्रीज या तो बंद हो गये या फिर उन्होंने अपने काम के स्वरूप को ही बदल दिया. आज बमुश्किल से ही तुपुदाना की 5-7 कंपनियां ही कभी कभार एचईसी से मिले वर्क ऑर्डर को पूरा करती हैं.

एचईसी के भरोसे रहने वाली कंपनियों का वजूद आज मिट चुका है. इसका सीधा असर तुपुदाना में एचईसी के ऑर्डर पर काम करने वाली इंडस्ट्री के कामगार और मजदूरों पर भी पड़ा है. इंडस्ट्रीयल एरिया में काम करने वाले सोमरा मिस्त्री पुराने दिनों को याद करते हुए अपनी आमदनी का जिक्र करते हैं और बताते हैं कि पहले इंडस्ट्रियल एरिया में इतनी खामोशी कभी नहीं थी. काम इतना होता था कि लोग शिफ्ट में काम करते थे.



मजदूरी कर पांच लोगों का पेट पालने वाली सुमति उरांव बताती हैं कि जब से एचईसी से काम मिलना काम हुआ है, पगार में भी कमी आयी है. तुपुदाना इंडस्ट्रीयल एरिया के कोषाध्यक्ष विनोद तुलस्यान की माने तो सत्तर के दशक से लेकर अभी तक 75 फीसदी इंडस्ट्री बंद हो चुकी है. वहीं बचे हुए 25 फीसदी भी मरनासन्न स्थिति में हैं. इनमें से ज्यादातर इंडस्ट्रीज ने अपना प्रोडक्शन बदल दिया है.
दरअसल एचईसी मुख्य रूप से मशीनींग, फैब्रिकेशन, रिफैक्ट्रीज और आयरन कास्टिंग का ही काम करती है. और इनसे ही संबंधित वर्क ऑर्डर दूसरे इंडस्ट्री को देती है. लेकिन जैसे जैसे एचईसी में भट्ठियों की आग धीमी पड़ती गयी, फायर ब्रिक्स ईंटों की जरूरत और उससे जुड़े ऑर्डर भी कम होते गये. इसका सीधा असर एंसीलरी इंडस्ट्री और वहां काम करने वाले कामगारों पर पड़ा.

चूंकि एचईसी एक मदर इंडस्ट्री है. लिहाजा इसपर दूसरी इंडस्ट्री के पालन पोषण की भी जिम्मेदारी है. एक्सपर्ट की मानें तो आज जरूरत इस बात की है कि एचईसी को नये प्रोडक्ट्स बनाने की जिम्मेदारी दी जाए. ताकि इस मदर इंडस्ट्री की भूमिका का भी विस्तार हो सके और इससे जुड़ी दूसरी सहायक इंडस्ट्रीज भी फिर से अपना खोया वजूद पा सकें.
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