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रांची पहुंचकर भी घर नहीं जा पा रहे प्रवासी मजदूर, कहां से लाएं 12 से 15 हजार रुपये

रांची में फंसे सैकड़ों मजदूर पैसों के अभाव में घर नहीं जा पा रहे हैं. (फाइल फोटो)
रांची में फंसे सैकड़ों मजदूर पैसों के अभाव में घर नहीं जा पा रहे हैं. (फाइल फोटो)

राजधानी के कांटाटोली बस स्टैंड में सैकड़ों मजदूर (Laborers) फंसे हुए हैं. पैसों के अभाव में वे घर नहीं जा पा रहे हैं.

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रांची. कोरोना संकट (Corona Crisis) में घर लौट रहे प्रवासी मजदूरों (Migrant Laborers) की प्रदेश पहुंचकर भी परेशानी कम होती नहीं दिख रही. राजधानी रांची में जहां-तहां ऐसे सैकड़ों मजदूर फंसे हुए हैं, जो यहां से घर नहीं जा पा रहे हैं. इनके लिए सरकार की तरफ से कोई इंतजाम नहीं है. प्राइवेट टैक्सी वाले घर पहुंचाने के लिए 12 से 15 हजार रुपए तक मांग रहे हैं. अब खाली हाथ प्रदेश लौटे ये मजदूर कहां से इतने पैसे लाएं.

चेन्नई में सालों से नौकरी कर रहे दुमका के संजीव कुमार कोरोना से बचने के लिए एक सप्ताह पहले वहां से गृह प्रदेश के लिए निकल गये. संजीव किसी तरह राजधानी रांची पहुंच भी गये, लेकिन अब यहां से दुमका कैसे जाएं, इसके लिए न तो उनके पास पैसे हैं और न ही पैदल चलने की हिम्मत. संजीव जैसे लोगों के लिए सरकारी स्तर पर भी कोई इंतजाम नहीं है, जिससे वे अपने घर पहुंच जाएं.

संजीव की तरह सैकड़ों मजदूर इन दिनों राजधानी के कांटाटोली बस स्टैंड में फंसे हुए हैं. पैसों के अभाव में वे घर नहीं जा पा रहे हैं. प्राइवेट टैक्सी वाले दुमका, पाकुड़ और पलामू जैसे जगहों पर जाने के लिए 12 से 15 हजार रुपये मांग रहे हैं.



विपक्ष ने सरकार पर बोला हमला 
प्रवासियों की इस परेशानी पर विपक्ष सरकार पर हमलावर हो गया है. बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष दीपक प्रकाश की मानें तो प्रवासियों के प्रति सरकार असंवेदनशील हो चुकी है. सरकार के ग्रामीण विकास मंत्री आलमगीर आलम भी मानते हैं कि प्रवासियों को कई परेशानियां से जरूर गुजरना पड़ रहा है, लेकिन इसके सरकारी स्तर पर समाधान भी किये जा रहे हैं. सरकार मजदूरों को बसों से घर पहुंचा रही है.

6 लाख प्रवासी अभी भी बाहर में 
कोरोना संकट में प्रवासियों का घर लौटना जारी है. अब तक राज्य में एक लाख से अधिक प्रवासी जैसे तैसे घर पहुंच गये हैं. मगर अभी भी करीब छह लाख लोग बाहर में फंसे हुए हैं. इन्हें लाने के लिए स्पेशल ट्रेन और बसें चलाई जा रही हैं. हालांकि, अंतरजिला जाने के लिए कोई व्यवस्था नहीं है.

इनपुट- भुवन किशोर झा

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